संघ की शताब्दी यात्रा और भविष्य की चुनौतियाँ

संघ की शताब्दी यात्रा : आत्ममंथन, आत्मविलोप और भविष्य की चुनौतियाँ

संघ की सौ वर्ष की यात्रा उपहास से अपेक्षा तक पहुँची है। अब संवाद, सामाजिक विश्वसनीयता, समन्वय और मूल वैचारिक अधिष्ठान बनाए रखना उसकी प्रमुख चुनौतियाँ हैं।

By : स्वदेश डेस्क
संघ की शताब्दी यात्रा : आत्ममंथन, आत्मविलोप और भविष्य की चुनौतियाँ

आज एक ऐतिहासिक घड़ी है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के तत्काल बाद अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। मार्च में आयोजित अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के बाद संघ के संगठनात्मक स्वरूप में होने वाले परिवर्तनों की रूपरेखा भी इस बैठक में सामने आएगी। इस नाते भी बैठक का विशेष महत्व है।

संघ की तुलना संघ से ही संभव है

भारत ही नहीं, विश्व के संगठनात्मक इतिहास में भी संघ की यात्रा विलक्षण है। उसकी कल्पना, कार्यपद्धति, संगठनात्मक रचना और सामाजिक प्रभाव का आकलन अपने आप में एक विशिष्ट अध्ययन का विषय है। उसकी तुलना के लिए भी संघ को ही सामने रखना होगा। हिंदी काव्यशास्त्र में अनन्वय अलंकार का उल्लेख मिलता है. जिसमें उपमेय की उपमा उसी से दी जाती है, क्योंकि उसके समान कोई दूसरा नहीं होता। रामायण का प्रसिद्ध श्लोक है.

गगनं गगनाकारं सागरः सागरोपमः।

रामरावणयोबुद्धं रामरावणयोरिव॥

अर्थात् आकाश की तुलना आकाश से और सागर की तुलना सागर से ही संभव है। संघ की सौ वर्ष की यात्रा को समझने के लिए भी उसके अपने अनुभवों और उपलब्धियों के साथ उसकी चुनौतियों को ही आधार बनाना होगा।

उपहास से अपेक्षा तक

संघ की एक शताब्दी की यात्रा अभूतपूर्व रही है। स्थापना के समय उपहास, फिर उपेक्षा और उसके बाद विरोध-संघ ने अनेक चरण देखे हैं। आज स्थिति यह है कि विरोध के साथ समाज के एक बड़े वर्ग की अपेक्षाएँ भी उससे जुड़ी हैं। यह उसके सामाजिक विस्तार और स्वीकार्यता का संकेत है।

संघ की कार्यपद्धति का एक उल्लेखनीय पक्ष उसका संवाद संबंधी दृष्टिकोण है। सह सरकार्यवाह श्री अरुण कुमार से जब संघ पर कट्टरता के आरोपों के बारे में पूछा गया तो उनके उत्तर का आशय था कि संघ किस्सों को अपना शत्रु या विरोधी नहीं मानता। वह मानता है कि अपनी बात संबंधित लोगों तक ठीक से पहुंचा नहीं पाया है। जिस दिन उन तक पहुँचेगे, वे भी हमारे साथ होंगे।

समाज को बाँटना नहीं, जोड़ना, मतभेदों को स्थायी शत्रुता में नहीं बदलना और संवाद के माध्यम से आत्मीयता विकसित करना-यही संभ की घोषित कार्यपद्धति का मूल भाव है।

समाज के भीतर संगठन नहीं, 

संपूर्ण समाज का संगठन

संघ के वरिष्ठ विचारक स्वर्गीय माधव गोविंद वैद्य का एक कथन इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है-संघ समाज के भीतर खड़ा कोई अलग संगठन मात्र नहीं, चल्कि संपूर्ण समाज का संगठन है।

इसी संदर्भ में शताब्दी वर्ष के दौरान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत से जब सी वर्षों की उपलब्धियों के बारे में पूछा गया ती उनके उत्तर का भाव था कि संतोष अवश्य है, लेकिन इस बात की पोड़ा भी है कि संपूर्ण समाज को संगठित करने में इतना समय क्यों लगा?

यह उत्तर संघ की आत्माछाँव और उसके घोषित लक्ष्य को समझने की दृष्टि देता है। संगठन का अंतिम उद्देश्य अपना पृथक अस्तित्व बनाए रखना नहीं, बल्कि अपने विचार को समाज के जीवन में प्रतिष्ठित करना है। अपने विचार को समाज में स्थापित करके स्वयं उसी समाज में विलीन कर देने की आकांक्षा ही आत्मविलोप का भाव है।

आज जब प्रसिद्धि और व्यक्तिगत पहचान सफलता के बड़े पैमाने बन गए हैं, तब किसी संगठन का अपने पृथक अस्तित्व से आगे बढ़कर समाज में विलीन होने की कल्पना करना उसका वैशिष्ट्य बताता है।

युगानुकूल परिवर्तन पर

वैचारिक अधिष्ठान अटल

वरिष्ठ प्रचारक स्वर्गीय श्री रंगाहरि जी का एक सूत्रवाक्य है-संघ के सामने सबसे बड़ी चुनौती संघ को संघ बनाए रखने की है। आपने सूत्र वाक्य में सब कुछ कह दिया। समाज का एक बड़ा वर्ग संघ विचार से प्रेरित सभी संगठनों को संघ दृष्टि से ही देखना चाहता है। विशेषकर भाजपा में कहीं कहीं वैचारिक विचलन और आर्थिक स्तर पर आए स्खलन ने गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। बेशक संघ उसके लिए सीधे उत्तरदायी नहीं, पर समाज की अपेक्षा तो है।

पिछले सौ वर्षों में संघ ने समय के अनुरूप अपने कार्यक्रमों, आयोजनों, संगठनात्मक रचनाओं और गणवेश में परिवर्तन किए हैं। कार्यपद्धति को भी विकसित किया है, किंतु वैचारिक पहचान और मूल अधिष्ठान को अबुण्ण रखा है। सह सरकार्यवाह श्री अरुण कुमार के अनुसार संघ ने समय के साथ सब कुछ बदला, नहीं बदला तो अपना मूल भाव और वैचारिक अधिष्ठान।

विचार का विस्तार, संगठन का विकास और सामाजिक स्वीकार्यता महत्वपूर्ण हैं, लेकिन प्रश्न यह भी है कि सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकात्मता और व्यापक सामाजिक सहभागिता के लक्ष्य कितनी दूर तक।
साकार हुए है।

अयोध्या में श्रीराम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के समय देशभर में दिखाई दिया उत्साह इसका एक उदाहरण था। उस अवसर पर डॉ. मोहन भागवत ने मन की अयोध्या सजाने का संदेश दिया था। इसका आशय केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं था। व्यक्ति के आचरण, सामाजिक संबंधों और राष्ट्रीय जीवन में आदर्शों की प्रतिष्य भी इसका हिस्सा है। राम मंदिर सहित कई आंदोलन आज समाज के आंदोलन बन रहे हैं। जंतर मंतर पर देश के खिलाफ उठे स्वरों के खिलाफ आज देश में स्वयंस्फूर्त वातावरण है। यह संघ विचार की स्वीकार्यता है। पर अभी भी एक बड़ा वर्ग जो प्रामाणिक है, संघ से स्वयं को सीधा जोड़ने से हिचक रहा है, यह क्यों है, विचार इस पर नेतृत्व निश्चित कर ही रहा होगा।

विश्वास और समन्वय: भविष्य की निर्णायक पूँजी

आज देश का सार्वजनिक जीवन अनेक राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक चुनौतियों से गुजर रहा है। ऐसे समय में संघ के सामने बढ़ती सामाजिक अपेक्षाएँ अवसर भी है और चुनौती भी। इन अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए संवाद, कार्यपद्धति और सामाजिक विश्वसनीयता को निरंतर कसौटी पर कसना होगा। इसी प्रकार संघ से प्रेरित विभिन्न संगठनों के बीच समन्वय और परस्पर विश्वास भी महत्वपूर्ण है। सभी संगठनों की कार्यशैली और प्राथमिकताएँ एक जैसी नहीं हो सकती। साझा उद्देश्य का अर्थ एकरुपता नहीं, बल्कि विविधता के बीच सहयोग, स्वतंत्र कार्यक्षेत्रों का सम्मान और मतभेदों का संवादपूर्ण समाधान है। भ्रम और अविश्वास की स्थितियों से बचने का उपाय सतत संवाद और एक-दूसरे के दृष्टिकोण को समझने की तत्परता ही है।

शताब्दी के बाद विस्तार से अधिक महत्वपूर्ण दिशा

संघ की शताब्दी के बाद की यात्रा का मूल्यांकन केवल उसके विस्तार या नए कार्यक्षेत्रों से नहीं होगा। अधिक महत्वपूर्ण यह होगा कि इस विस्तार के साथ कार्यपद्धति में कितनी गुणवत्ता आई, समाज के साथ संबंध कितने आत्मीय हुए और राष्ट्रीय जीवन में उसके घोषित मूल्यों की कितनी सार्थक अभिव्यक्ति हुई।

इंदौर की यह बैठक इसी व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण है। संघ के सामने दी दायित्व एक साथ है-समय के अनुरूप स्वयं को विकसित करना और अपने मूल उद्देश्य के प्रति निष्ठा बनाए रखना। इस अर्थ में इंदौर आज एक नैमिषारण्य है। राष्ट्रऋषियों का यहा संगम विचार का ऐसा नवनीत देगा, जो संघ की आगामी यात्रा को दिशा देने के साथ समाज को भी पुष्ट करेगा।


(लेखक स्वदेश समूह के समूह संपादक हैं)

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