राजधानी में इस महीने के अंत तक कृषि भवन और शास्त्री भवन खाली हो जाएंगे। आदेश आ चुका है। राजधानी के दिल में दशकों से खड़ी ये दो इमारतें अब इतिहास के पन्नों में चली जाएंगी। पत्थर और सीमेंट से बनी इमारतों के अंदर पूरा इतिहास समाया हुआ है। इनमें स्वतंत्र भारत के सपने गूंजे, संघर्ष थमे और उपलब्धियां दर्ज हुईं। कृषि भवन में भुखमरी से आत्मनिर्भरता तक का रास्ता देश ने तय किया। शास्त्री भवन की दीवारों ने शिक्षा, कानून, संस्कृति और शासन को सालों तक संभाला। कृषि भवन करीब 1957 में बना, शास्त्री भवन 1967 के आसपास। दोनों उस समय की याद हैं, जब नॉर्थ ब्लॉक-साउथ ब्लॉक के बाद देश को और छत की जरूरत थी और साधन कम होने के बावजूद उम्मीदें बड़ी थीं।
हरित क्रांति की नींव
कृषि भवन को केंद्रीय लोक निर्माण विभाग के वास्तुकारों ने डिजाइन किया था। यह मुख्य रूप से कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय तथा पशुपालन, डेयरी एवं मत्स्य पालन मंत्रालय का मुख्यालय रहा। स्वतंत्रता के बाद भारत में खाद्यान्न संकट गहरा था। 1943 के बंगाल अकाल की स्मृति अभी ताजा थी और 1960 के दशक तक देश को अनाज के लिए विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता था। इसी कृषि भवन में उस दशक में हरित क्रांति की नींव रखी गई। यहां महान कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन और मेक्सिको के नॉर्मन बोरलॉग किसानों तथा वैज्ञानिकों से मंत्रणा करते थे। उच्च उपज देने वाली गेहूं और धान की किस्में, उर्वरक, सिंचाई और नई तकनीक यहीं से नीति का रूप लेती थीं। सी. सुब्रमण्यम, बाबू जगजीवन राम, शरद पवार, देवी लाल जैसे नेताओं ने यहीं से कृषि मंत्री के रूप में काम किया। बाद के वर्षों में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, फसल बीमा और जैविक खेती जैसी योजनाएं भी यहीं से चलीं। कृषि भवन सिर्फ नीति का केंद्र नहीं, राज्यों के साथ समन्वय का हब भी रहा। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के खेतों में जो हरियाली दिखी, उसकी कई फाइलें इन्हीं गलियारों से निकलीं।
अब वही सात मंजिला इमारत खाली होने जा रही है। यहां काम करने वाले दफ्तर कर्तव्य भवन के नए परिसर में शिफ्ट हो रहे हैं। नई इमारतें प्री-इंजीनियर्ड स्टील संरचना वाली होंगी, बेसमेंट, ग्राउंड और ऊपरी मंजिलों के साथ। पुरानी इमारतें जगह की कमी, उम्रदराज इंफ्रास्ट्रक्चर और आधुनिक सुरक्षा-ऊर्जा मानकों की कमी के कारण तोड़ी जा रही हैं। फिर भी सवाल यही है कि इतिहास सिर्फ नई इमारत में शिफ्ट हो जाता है या कुछ पीछे छूट जाता है।
कितने दफ्तर एक छत के नीचे
राजेंद्र प्रसाद रोड, जो कभी क्वीन मेरी रोड कहलाती थी, पर स्थित शास्त्री भवन में शायद किसी और सरकारी इमारत से ज्यादा केंद्र सरकार के दफ्तर रहे। इसके बनने से पहले वहां कुछ सरकारी बंगले और एक प्राइमरी स्कूल भी थे। यहां मानव संसाधन विकास मंत्रालय (अब शिक्षा मंत्रालय), विधि एवं न्याय, सूचना एवं प्रसारण, विधायी विभाग, संस्कृति, रसायन एवं उर्वरक जैसे मंत्रालय सालों तक चले। पत्रकार, वकील, शिक्षक संगठन और संस्कृति से जुड़े लोग रोज यहां आते थे। शास्त्री भवन का माहौल अन्य सचिवालय भवनों से थोड़ा अलग था। एक ही परिसर में शिक्षा, कानून और प्रसारण साथ-साथ चलते थे, इसलिए गलियारे हमेशा हलचल भरे रहते थे। इनके टूटने के बाद नए भवनों का निर्माण सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास का अगला बड़ा चरण होगा। निर्माण भवन और उद्योग भवन के बाद अब इन्हीं दो परिसरों की बारी है। कई मंत्रालय पहले ही नए कर्तव्य भवनों में स्थानांतरित हो चुके हैं। शेष दफ्तरों को महीने के अंत तक परिसर खाली करना है, ताकि साइट एजेंसी को सौंपी जा सके।
किसके भित्ति चित्र
शास्त्री भवन आने-जाने वालों ने दीवारों पर लगे भित्ति चित्र जरूर देखे होंगे। रंगों का सामंजस्य अतुलनीय है। इन्हें प्रख्यात चित्रकार सतीश गुजराल ने 1968 के आसपास बनाया था। गुजराल ने मेक्सिको में डिएगो रिवेरा से भित्ति चित्र की परंपरा सीखी थी और भारत लौटकर उसे अपनी शैली दी। दिल्ली हाईकोर्ट और ओडियन सिनेमा की दीवारों पर भी उनके काम हैं। भित्ति चित्र का अर्थ है दीवार पर बनाया गया चित्र। इसकी शुरुआत गुफाओं की दीवारों पर प्राकृतिक रंगों से जीवन के दृश्य बनाने से हुई। मनुष्य जैसे-जैसे सुसंस्कृत हुआ, यह शैली भी बदली। शास्त्री भवन के ये म्यूरल सार्वजनिक कला के उदाहरण हैं। दफ्तर जाने वाला कर्मचारी भी रुककर उन्हें देखता था।
शास्त्री भवन टूटने से पहले संस्कृति मंत्रालय, राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय और सतीश गुजराल फाउंडेशन इन चित्रों को सुरक्षित उतारने, संरक्षित करने और नए स्थान पर लगाने की तैयारी कर रहे हैं। लगभग साठ साल पुरानी ये कृतियां भवन के साथ नहीं मिटेंगी, यह आश्वासन है। फिर भी सवाल बना रहता है कि किसी इमारत की दीवार से उतारकर कहीं और लगाने पर वह वही अनुभव देता है या नहीं, जो दशकों तक उसी जगह से मिलता रहा।इससे एक और सवाल इन दोनों भवनों के टूटने-बनने से जुड़ा है। यहां रहने वाले सैकड़ों बंदर कहां जाएंगे। ये दिन भर परिसर में घूमते रहते हैं। हजारों सरकारी कर्मचारी और ये बंदर एक-दूसरे को खास कष्ट दिए बिना अपना काम निपटाते हैं।
दोनों भवन स्वतंत्र भारत के उस दौर की याद हैं, जब देश साधनों की कमी में भी बड़े सपने देख रहा था। नई इमारतें आधुनिक होंगी, ऊर्जा व्यवस्था बेहतर होगी। लेकिन कृषि भवन की फाइलों में हरित क्रांति की गूंज और शास्त्री भवन की दीवारों पर गुजराल के रंग बिखरे थे। ये चीजें सिर्फ पत्थर नहीं थीं। राजधानी जब इन्हें गिराएगी, तो सिर्फ दो पुराने दफ्तर नहीं हटेंगे। एक पूरा प्रशासनिक युग अपनी जगह छोड़कर नई इमारतों में चला जाएगा। नया जरूर बने, पर पुराने का हिसाब-किताब सिर्फ तोड़ने तक सीमित न रहे।

विवेक शुक्ला
(लेखक इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के पूर्व सलाहकार हैं)