पश्चिम एशिया में बढ़ता अमेरिका-ईरान तनाव

पश्चिम एशिया में फिर बढ़ा संघर्ष

अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष से पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ी है। परमाणु विवाद और परोक्ष युद्ध के साथ संघर्ष गहराया, वैश्विक प्रभाव भी पड़ रहा है।

By : नरेंद्र कुमार
पश्चिम एशिया में फिर बढ़ा संघर्ष

इस सप्ताह संयुक्त राष्ट्र में अपने भाषण के दौरान ईरान को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बयानों ने दोनों देशों के बीच तनाव को फिर बढ़ा दिया है। अमेरिका और ईरान के बीच पश्चिम एशिया में बढ़ता संघर्ष वैश्विक राजनीति के सबसे संवेदनशील भू-राजनीतिक संघर्षों में से एक है। दशकों के पारस्परिक संदेह, वैचारिक विरोध और प्रतिस्पर्धी रणनीतिक हितों से उपजा यह टकराव प्रतिबंधों और परोक्ष संघर्षों से विकसित होकर प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाइयों, लक्षित हत्याओं और साइबर युद्ध तक पहुंच चुका है। यह संघर्ष केवल द्विपक्षीय विवाद नहीं है, बल्कि पश्चिम एशिया की क्षेत्रीय व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक विशेषता बन गया है। इसका प्रभाव वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, परमाणु अप्रसार व्यवस्था और क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ता है।

रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता की जड़ें

अमेरिका-ईरान संघर्ष की वर्तमान संरचना की शुरुआत 1979 की ईरानी इस्लामी क्रांति से मानी जाती है। इस क्रांति ने अमेरिका समर्थित राजशाही को ऐसे इस्लामी गणराज्य में बदल दिया, जिसने पश्चिमी प्रभाव का विरोध अपनी राजनीति का प्रमुख आधार बनाया। इसके बाद बंधक संकट, ईरान-इराक युद्ध के दौरान इराक के प्रति अमेरिकी समर्थन और 2002 में वाशिंगटन द्वारा ईरान को 'एक्सिस ऑफ एविल' का हिस्सा घोषित किए जाने जैसी घटनाओं ने दोनों देशों के बीच अविश्वास को गहरा किया।ईरान का परमाणु कार्यक्रम इस प्रतिद्वंद्विता का केंद्रीय विषय बन गया। अमेरिका और उसके सहयोगी इसे संभावित परमाणु हथियार क्षमता की दिशा में कदम के रूप में देखते रहे हैं, जबकि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को शांतिपूर्ण उद्देश्यों और राष्ट्रीय अधिकार से जोड़ता रहा है। 2015 में हुए संयुक्त व्यापक कार्ययोजना ने कुछ समय के लिए तनाव कम किया, लेकिन 2018 में ट्रम्प प्रशासन के अमेरिका को समझौते से अलग करने और 'अधिकतम दबाव' की नीति अपनाने के बाद टकराव फिर तेज हो गया।

हितों का टकराव

अमेरिका का प्रमुख रणनीतिक उद्देश्य ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव को सीमित करना, इजराइल और खाड़ी क्षेत्र के सहयोगियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना तथा फारस की खाड़ी से ऊर्जा के निर्बाध प्रवाह को बनाए रखना है। दूसरी ओर, ईरान अपनी सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव बनाए रखने के लिए 'आक्रामक रक्षा' की रणनीति अपनाता है। इसके तहत इराक, सीरिया, लेबनान और यमन में उसके समर्थक सशस्त्र समूहों का नेटवर्क महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।अमेरिकी सैन्य और तकनीकी श्रेष्ठता तथा ईरान के गैर-राज्य सहयोगियों के नेटवर्क ने एक ऐसा जटिल संघर्ष पैदा किया है, जिसमें प्रत्यक्ष युद्ध से बचने की कोशिश तो होती है, लेकिन तनाव के अचानक व्यापक संघर्ष में बदल जाने का खतरा बना रहता है।

बढ़ते तनाव के कारण

हाल के तनाव के पीछे कई कारक हैं। पहला, कूटनीतिक ढांचों का कमजोर होना है। परमाणु समझौते के क्षरण ने ईरान को संयम बरतने के लिए मिलने वाले प्रोत्साहनों को कम किया है। इससे ईरान में उन शक्तियों को बल मिला है, जो समझौते की तुलना में प्रतिरोध को राष्ट्रीय हितों की बेहतर सुरक्षा का माध्यम मानती हैं।दूसरा, क्षेत्रीय परोक्ष संघर्ष अधिक घातक हुए हैं। ईरान समर्थित सशस्त्र समूहों ने इराक और सीरिया में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया है, जबकि अमेरिकी ड्रोन और हवाई हमलों में वरिष्ठ ईरानी कमांडर मारे गए हैं। 2020 में कासिम सुलेमानी की हत्या इसका सबसे प्रमुख उदाहरण रही। ऐसी कार्रवाइयों ने परोक्ष और प्रत्यक्ष युद्ध के बीच की रेखा को धुंधला कर दिया है।तीसरा, युद्ध की तकनीक और उसका क्षेत्र लगातार विस्तृत हुआ है। परमाणु प्रतिष्ठानों, तेल ढांचे और जहाजों पर साइबर हमले यह दिखाते हैं कि डिजिटल युद्ध अब सैन्य अभियानों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता तथा होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री यातायात को प्रभावित करने की उसकी क्षमता ने अनिश्चितता को और बढ़ाया है।

चौथा, दोनों देशों की घरेलू राजनीति भी कठोर रुख को बढ़ावा देती है। अमेरिका में ईरान को रोकने को लेकर व्यापक राजनीतिक सहमति कूटनीतिक लचीलेपन को सीमित करती है। ईरान में आर्थिक प्रतिबंधों से उत्पन्न कठिनाइयां राष्ट्रवादी राजनीति को मजबूत करती हैं, जहां पश्चिम के सामने अवज्ञा को संप्रभुता और राष्ट्रीय गरिमा से जोड़ा जाता है।

क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव

अमेरिका-ईरान तनाव का प्रभाव दोनों देशों के संबंधों से कहीं आगे तक जाता है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी देश अमेरिकी सुरक्षा गारंटी पर निर्भर हैं, लेकिन वे व्यापक युद्ध में सीधे खिंचे जाने की आशंका से भी चिंतित हैं। इजराइल ईरान को अपनी सुरक्षा के लिए गंभीर खतरे के रूप में देखता है। इससे क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण और जटिल हो जाते हैं।वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ा खतरा ऊर्जा बाजारों को है। होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व के तेल व्यापार का महत्वपूर्ण मार्ग है। यहां किसी बड़े अवरोध या जहाजों पर हमले से तेल की कीमतों में तेज वृद्धि हो सकती है, जिससे मुद्रास्फीति बढ़ेगी और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ेगा।

परमाणु अप्रसार व्यवस्था पर भी इसका गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। यदि ईरान इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि केवल परमाणु प्रतिरोधक क्षमता ही उसकी सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है, तो वह अपने परमाणु कार्यक्रम को तेज कर सकता है। ऐसी स्थिति में सऊदी अरब, तुर्की और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के बीच परमाणु हथियारों की होड़ की आशंका बढ़ सकती है।

यह तनाव बहुपक्षीय व्यवस्था को भी कमजोर करता है। अमेरिका की एकतरफा नीतियों ने उन यूरोपीय सहयोगियों के लिए स्थिति कठिन की है, जो परमाणु समझौते को बनाए रखना चाहते थे। दूसरी ओर, रूस और चीन के साथ ईरान की बढ़ती निकटता पश्चिमी नेतृत्व वाली संस्थाओं से उसके दूर जाने की प्रक्रिया को मजबूत करती है।

तनाव कम करने का रास्ता

गंभीर स्थिति के बावजूद तनाव कम करने के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। सबसे पहले नई कूटनीतिक पहल आवश्यक है। विश्वास की कमी के बावजूद कैदियों की अदला-बदली, परमाणु संवर्धन पर सीमित रोक के बदले प्रतिबंधों में राहत जैसे अंतरिम समझौते संवाद का आधार तैयार कर सकते हैं।दूसरा, क्षेत्रीय संवाद तंत्र विकसित किया जाना चाहिए, जिसमें तटस्थ मध्यस्थों की भूमिका हो। इसमें परमाणु कार्यक्रम के साथ मिसाइल क्षमता और परोक्ष संघर्षों से जुड़ी सुरक्षा चिंताओं पर भी चर्चा होनी चाहिए।तीसरा, अमेरिकी और ईरानी सैन्य कमांडरों के बीच घटना-रोकथाम तंत्र या हॉटलाइन जैसी व्यवस्थाएं आकस्मिक संघर्ष की आशंका को कम कर सकती हैं।

स्थायी शांति के लिए दोनों पक्षों को यह समझना होगा कि पूर्ण विजय की अवधारणा इस संघर्ष में व्यावहारिक नहीं है। अमेरिका विनाशकारी कीमत चुकाए बिना ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव को समाप्त नहीं कर सकता और ईरान भी गंभीर परिणामों के बिना अमेरिकी दबाव को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकता। इसलिए स्थिर संतुलन का आधार सह-अस्तित्व और संवाद होना चाहिए, विजय नहीं।पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान का बढ़ता संघर्ष गहरे संरचनात्मक तनावों, वैचारिक असहमति, सुरक्षा संबंधी दुविधाओं और क्षेत्रीय प्रभाव के लिए प्रतिस्पर्धा का परिणाम है। तत्काल कारण परमाणु विवाद, परोक्ष युद्ध और लक्षित हमले हो सकते हैं, लेकिन इसके पीछे प्रभाव और सुरक्षा को लेकर लंबे समय से चली आ रही रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है।

कूटनीतिक चैनलों को पुनर्जीवित करने और संकट-प्रबंधन की प्रभावी व्यवस्था बनाने में विफलता व्यापक युद्ध का जोखिम बढ़ा सकती है। ऐसे समय में नीति-निर्माताओं के लिए तनाव कम करना, व्यावहारिक कूटनीति को प्राथमिकता देना और स्थिरता को रणनीतिक लक्ष्य बनाना सबसे महत्वपूर्ण है।

प्रो. अंशु जोशी
(लेखिका जेएनयू में प्राध्यापक हैं)

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