शब्दों से समाज की आत्मा लिखने वाले साहित्यकार विरले होते हैं। 31 जुलाई केवल जन्मतिथि नहीं, उस युगदृष्टा का स्मरण है, जिसकी लेखनी आज भी अन्याय और विषमता से प्रश्न करती है। लमही में जन्मे धनपत राय, जिन्हें साहित्य ने प्रेमचंद के रूप में अमर किया, उन्होंने साहित्य को अभिजात्य सीमाओं से निकालकर खेत-खलिहानों, चौपालों और झोपड़ियों की आवाज़ बनाया। किसान की विवशता, जातिगत पीड़ा, नारी संघर्ष और अभावों से जूझते परिवार उनके पात्र नहीं, बल्कि समाज का यथार्थ थे। आज भी असमानता के बीच प्रेमचंद की लेखनी सामाजिक आत्ममंथन का विश्वसनीय दर्पण बनी हुई है।
संघर्षों से हार न मानने वाले ही इतिहास में अमिट पहचान बनाते हैं। आठ वर्ष की आयु में माँ और सोलह वर्ष की आयु में पिता का साथ छूट गया। निर्धनता ने राह कठिन की, पर इन्हीं अभावों ने उन्हें समाज के दर्द को समझने वाली संवेदना दी।फ़ारसी-उर्दू के अध्ययन से प्रारंभ हुई उनकी लेखनी 'नवाब राय' नाम से आगे बढ़ी। 1907 में प्रकाशित 'सोज़-ए-वतन' अंग्रेज़ी शासन को असहज कर गई और प्रतिबंधित हुई। इसी दमन से 'प्रेमचंद' नाम का वह साहित्यिक स्वर जन्मा, जिसने सामंती अहंकार, जातिगत अन्याय, शोषण और विषमता के विरुद्ध निर्भीक आवाज़ उठाई।
महान साहित्यकारों की अमरता उनके पात्रों में होती है। गोदान का होरी मेहनतकश भारत का चेहरा है, जो संघर्ष करते हुए भी सम्मान की तलाश नहीं छोड़ता। रंगभूमि का सूरदास अन्याय के विरुद्ध साहस का प्रतीक है, जबकि निर्मला और सेवासदन सामाजिक कुरीतियों और दोहरे मापदंडों पर तीखा प्रहार करते हैं। प्रेमचंद ने पात्रों को आदर्श नहीं, बल्कि संघर्ष, पीड़ा और आशा से भरे सामान्य मनुष्यों के रूप में प्रस्तुत किया। इसलिए उनकी रचनाओं में आज भी समाज की विडंबनाएँ जीवंत दिखाई देती हैं।जब साहित्य समाज की सच्चाइयों का दर्पण बन जाता है, तभी उसकी सार्थकता सिद्ध होती है। उनकी कहानियों का विशाल संग्रह मानसरोवर इसका प्रमाण है। ईदगाह का हामिद त्याग और प्रेम की ऊँचाई सिखाता है, कफन मानवीय विवशता का कठोर यथार्थ सामने रखता है, ठाकुर का कुआँ जातिगत भेदभाव पर प्रहार करता है और पंच परमेश्वर न्याय की नैतिक शक्ति स्थापित करता है। प्रेमचंद ने कृत्रिम भावुकता नहीं, बल्कि जीवन के सत्य को ईमानदारी से प्रस्तुत किया, जिससे पाठक आत्ममंथन के लिए प्रेरित होता है।
प्रेमचंद की भाषा उनकी सबसे बड़ी शक्ति थी। उसमें न दरबारी आडंबर था, न कृत्रिम विद्वता; बल्कि गाँव की मिट्टी की सोंधी गंध, चौपाल की सहजता और जनजीवन की सच्ची अभिव्यक्ति थी। उन्होंने सिद्ध किया कि साहित्य की ऊँचाई कठिन शब्दों से नहीं, गहरी संवेदना से तय होती है। उनकी भाषा सरल होकर भी मनुष्य के हृदय और विवेक को स्पर्श करती है।लेखक की पहचान उसकी निर्भीक सोच से होती है। गांधीजी के विचारों से प्रेरित होकर भी प्रेमचंद ने किसी विचारधारा का अंधानुकरण नहीं किया। हंस और जागरण के माध्यम से उन्होंने पत्रकारिता को समाज-सुधार का माध्यम बनाया। लेखन को आजीविका बनाया, लेकिन कलम को कभी सत्ता, बाज़ार या प्रतिष्ठा के दबाव में नहीं झुकाया।
8 अक्टूबर 1936 को उनका शरीर भले ही विदा हुआ, किंतु उनके विचार आज भी समाज का मार्गदर्शन कर रहे हैं। वर्ष 2026 का भारत तकनीकी और आर्थिक प्रगति के दौर में है, फिर भी किसान की चिंता, सामाजिक असमानता, महिलाओं की सुरक्षा और जातिगत भेदभाव जैसे प्रश्न आज भी मौजूद हैं। ऐसे समय में प्रेमचंद का साहित्य अतीत नहीं, वर्तमान का दर्पण बनकर सामने आता है। गोदान, निर्मला और ठाकुर का कुआँ आज भी हमारे समय की सच्चाइयों को उजागर करते हैं। यही उनकी कालजयी दृष्टि है कि हर पीढ़ी उनमें अपना चेहरा देख सकती है।प्रेमचंद को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब उनकी रचनाएँ केवल पुस्तकों तक सीमित न रहकर समाज की चेतना बनें। उन्होंने सिद्ध किया कि साहित्य का उद्देश्य प्रशंसा नहीं, बल्कि अंतरात्मा को जगाना है। जब तक किसान की पीड़ा, स्त्री की असुरक्षा, जातिगत भेदभाव और निर्धनों की आवाज़ मौजूद है, तब तक प्रेमचंद भारतीय चेतना के प्रकाशस्तंभ बने रहेंगे।
मैंने केवल वर्तनी, व्याकरण, विराम चिह्न, स्पेसिंग और टाइपिंग संबंधी त्रुटियाँ सुधारी हैं। लेख की मूल शैली, विचार और भाषा को यथावत रखा गया है।

कृति जैन
(लेखिका शिक्षाविद् व स्तंभकार हैं)