आरोपों में मर्यादा जरूरी

राष्ट्रीय सुरक्षा और संवेदनशील विषयों पर आरोपों में मर्यादा जरूरी

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर अधिक जिम्मेदार और तथ्य-आधारित चर्चा की मांग की गई है।

By : नरेंद्र कुमार
राष्ट्रीय सुरक्षा और संवेदनशील विषयों पर आरोपों में मर्यादा जरूरी

लोकतंत्र में प्रश्न पूछना जरूरी है, लेकिन प्रश्न को प्रमाण से जोड़ना उससे भी अधिक जरूरी है। केवल मंच से कही गई बात के आधार पर किसी व्यक्ति के बारे में धारणा बन जाना लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करता है। आज सोशल मीडिया के दौर में किसी राजनीतिक नेता का एक वक्तव्य कुछ ही समय में लाखों लोगों तक पहुंच जाता है।

लोकतंत्र में विपक्ष को सरकार से सवाल पूछने और उसकी नीतियों की आलोचना करने का पूरा अधिकार है। लेकिन जब चर्चा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील विषयों पर हो, तब राजनीतिक बयानबाजी में तथ्य, प्रमाण और मर्यादा का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। इंदौर में आयोजित 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम में राहुल गांधी ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को लेकर फोन, व्हाट्सऐप और फेसबुक की निगरानी तथा देश के कथित 'सिस्टम' को नियंत्रित करने से जुड़े आरोप लगाए। ये बातें मीडिया में राहुल गांधी के दावों के रूप में सामने आई हैं। ऐसे गंभीर दावों को स्थापित तथ्य मानने से पहले उनके आधार और प्रमाण पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

यहां अजीत डोभाल के व्यक्तित्व और उनकी लंबी सार्वजनिक सेवा को भी ध्यान में रखना चाहिए। जब राहुल गांधी स्वयं बचपन की अवस्था में थे, तब से डोभाल देश की सुरक्षा व्यवस्था में अपनी सेवाएं दे रहे थे। वे आज 81 वर्ष की आयु में भी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में सक्रिय हैं। सरकारी अभिलेखों के अनुसार, उन्होंने दशकों तक खुफिया सेवा में काम किया और देश के विभिन्न सुरक्षा मोर्चों से जुड़े रहे। 2014 में उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किया गया। किसी भी व्यक्ति की राजनीतिक आलोचना की जा सकती है, लेकिन डोभाल की पूरी सेवा-यात्रा को केवल किसी वर्तमान सरकार या राजनीतिक दल के संदर्भ में देखना उनके सार्वजनिक दायित्व की प्रकृति को संकुचित कर देना होगा। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार किसी राजनीतिक दल का पदाधिकारी नहीं होता। उसका दायित्व देश की सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों से जुड़ा होता है। सरकारें बदलती हैं, राजनीतिक दल सत्ता में आते-जाते हैं, लेकिन राष्ट्र की सुरक्षा व्यवस्था निरंतर चलती रहती है।

यही कारण है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े किसी अधिकारी पर आरोप लगाते समय राजनीतिक असहमति और व्यक्तिगत आरोप के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है। अजीत डोभाल की भूमिका और उनके निर्णयों की समीक्षा हो सकती है, उनकी नीतियों पर सवाल उठाए जा सकते हैं और किसी भी संवैधानिक पद की जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए। लेकिन गंभीर आरोपों के लिए उतने ही गंभीर प्रमाण भी सामने आने चाहिए। डोभाल की सेवा का बड़ा हिस्सा सार्वजनिक प्रचार से दूर रहा है। खुफिया और सुरक्षा क्षेत्र में काम करने वाले अधिकारियों की भूमिका का स्वभाव ही ऐसा होता है कि उनके कार्यों का पूरा विवरण सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। गृह मंत्रालय की 2026 की एक आधिकारिक विज्ञप्ति में उनके लंबे खुफिया सेवा-काल, पूर्वोत्तर, सिक्किम, जम्मू-कश्मीर, पंजाब और पाकिस्तान सहित विभिन्न सुरक्षा चुनौतियों से जुड़े अनुभव का उल्लेख किया गया है।

इसलिए किसी राष्ट्रीय सुरक्षा अधिकारी की आलोचना करते समय यह समझना भी जरूरी है कि सुरक्षा से संबंधित प्रत्येक निर्णय और गतिविधि सार्वजनिक मंच पर विस्तार से बताई जा सकने वाली चीज नहीं होती। यदि किसी नेता के पास नागरिकों की निजता के उल्लंघन, फोन निगरानी या किसी अन्य गैरकानूनी गतिविधि से संबंधित ठोस प्रमाण हैं, तो उन्हें संसद, न्यायपालिका या सक्षम जांच संस्था के सामने रखना अधिक सार्थक होगा। इससे आरोप राजनीतिक भाषण का हिस्सा न रहकर जांच योग्य तथ्य बन सकेंगे।

लोकतंत्र में प्रश्न पूछना जरूरी है, लेकिन प्रश्न को प्रमाण से जोड़ना उससे भी अधिक जरूरी है। केवल मंच से कही गई बात के आधार पर किसी व्यक्ति के बारे में धारणा बन जाना लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करता है। आज सोशल मीडिया के दौर में किसी राजनीतिक नेता का एक वक्तव्य कुछ ही समय में लाखों लोगों तक पहुंच जाता है। इसलिए शब्दों की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी हो गई है। विशेषकर राष्ट्रीय सुरक्षा, सेना, खुफिया एजेंसियों और नागरिकों की निजता जैसे विषयों पर सार्वजनिक आरोपों का असर सामान्य राजनीतिक बयान से कहीं व्यापक हो सकता है।

यह भी ध्यान रखना होगा कि डोभाल किसी राजनीतिक दल के कार्यकर्ता के रूप में राष्ट्रीय सुरक्षा के पद पर नहीं हैं। वे भारत सरकार के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं। वर्तमान सरकार ने उन्हें नियुक्त किया है, लेकिन उनकी संस्थागत भूमिका का संबंध राष्ट्र की सुरक्षा व्यवस्था से है। इस अंतर को बनाए रखना आवश्यक है। किसी सरकार के निर्णय से असहमति को उस सरकार के सुरक्षा सलाहकार के विरुद्ध व्यक्तिगत आरोपों में बदल देना स्वस्थ राजनीतिक विमर्श नहीं कहा जा सकता, जब तक आरोपों का ठोस आधार सामने न हो।

सरकार और विपक्ष दोनों लोकतंत्र के आवश्यक अंग हैं। विपक्ष का दायित्व है कि वह सरकार की कमियों को सामने लाए, कठिन प्रश्न पूछे और जनता के अधिकारों की आवाज उठाए। वहीं सत्ता पक्ष का दायित्व है कि वह उचित सवालों का जवाब दे और संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करे। लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर दोनों पक्षों से अतिरिक्त जिम्मेदारी की अपेक्षा होती है। अजीत डोभाल के प्रति सम्मान का अर्थ यह नहीं कि उन्हें आलोचना से परे माना जाए। किसी भी सार्वजनिक अधिकारी को लोकतांत्रिक जांच से ऊपर नहीं रखा जा सकता। लेकिन आलोचना और आरोप में अंतर है। आलोचना तथ्य और कार्यों के विश्लेषण पर आधारित होती है; आरोप के लिए प्रमाण की आवश्यकता होती है।

इंदौर में हुई टिप्पणी इसी व्यापक प्रश्न को सामने लाती है कि क्या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर आरोपों को राजनीतिक मंच पर कहने के साथ-साथ उनके प्रमाण भी देश के सामने नहीं रखे जाने चाहिए? यदि प्रमाण हैं तो उनकी जांच होनी चाहिए और यदि प्रमाण नहीं हैं तो ऐसे दावों को स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करने से बचना चाहिए। देश के लिए दशकों तक सुरक्षा क्षेत्र में काम करने वाले किसी अधिकारी के प्रति असहमति हो सकती है, उनके निर्णयों पर बहस हो सकती है, लेकिन उनकी लंबी सेवा को राजनीतिक चश्मे से देखना उचित नहीं होगा। 81 वर्ष की उम्र में भी राष्ट्रीय सुरक्षा के दायित्व का निर्वहन करना अपने आप में एक लंबी सार्वजनिक सेवा-यात्रा का संकेत है। सरकारी अभिलेख भी उनके दीर्घकालिक सुरक्षा अनुभव और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में उनकी निरंतर भूमिका को दर्ज करते हैं।

राजनीति में मतभेद रहेंगे, सरकारें बदलेंगी और विचारधाराओं के बीच संघर्ष भी चलता रहेगा। लेकिन राष्ट्र की सुरक्षा इन राजनीतिक सीमाओं से ऊपर का विषय है। सुरक्षा से जुड़े पदों पर काम करने वाले अधिकारियों को किसी दल विशेष से जोड़कर देखने के बजाय उनके संवैधानिक और संस्थागत दायित्व के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि यहां सवाल पूछने की आजादी है। लेकिन उसी लोकतंत्र की गरिमा यह भी मांगती है कि सवाल तथ्य पर हों, आरोप प्रमाण के साथ हों और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषय राजनीतिक कटुता के बजाय जिम्मेदार बहस का विषय बनें, न कि राजनीति के मंच पर मनोरंजन का विषय।

संदीप सृजन

(लेखक साहित्यकार, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।)

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