राहुल गांधी का विवादित धरना

गुरिल्ला धरने से राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती

राहुल गांधी और समर्थकों ने आकाशवाणी भवन में 'गुरिल्ला' शैली में प्रवेश कर धरना दिया, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर प्रश्न उठे हैं।

By : नरेंद्र कुमार
गुरिल्ला धरने से राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती

राहुल गांधी देश के प्रमुख विपक्षी नेता हैं। विपक्ष लोकतंत्र का अनिवार्य स्तंभ है और उसे सरकार की नीतियों, निर्वाचन आयोग तथा अन्य संस्थाओं के कामकाज पर सवाल उठाने का पूरा अधिकार है। लेकिन सार्वजनिक जीवन में किसी नेता की भूमिका जितनी बड़ी होती है, उसके आचरण का प्रभाव भी उतना ही व्यापक होता है। जब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष स्वयं सुरक्षा अवरोध पार कर राष्ट्रीय प्रसारण संस्थान के परिसर में बैठता है, तो उसके राजनीतिक संदेश का व्यापक प्रभाव पड़ता है।

राहुल गांधी और उनके समर्थकों द्वारा आकाशवाणी भवन परिसर में कथित तौर पर 'गुरिल्ला' शैली में प्रवेश कर धरना देने की घटना ने सुरक्षा तंत्र के सामने कई गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। क्या यह पूर्वनियोजित रणनीति थी या सुरक्षा व्यवस्था के निचले स्तर पर हुई चूक? क्या इसमें किसी तरह की मिलीभगत थी? इससे पहले भी राहुल गांधी के समर्थक सुरक्षा व्यवस्था को चकमा देकर प्रधानमंत्री निवास के दरवाजे तक पहुंचकर धरना दे चुके हैं। ऐसे छापामार प्रयासों के दौरान किसी आतंकी अथवा माओवादी-नक्सली तत्व की घुसपैठ हो जाए, तो भयावह परिणाम सामने आ सकते हैं।

दिल्ली पुलिस ने आकाशवाणी भवन में बिना अनुमति प्रवेश करने और परिसर में धरना देने के मामले में राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा तथा अन्य लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है। राहुल गांधी ने इसे राजनीतिक संघर्ष का प्रतीक बताते हुए कहा कि उनके विरुद्ध पहले से 45 प्राथमिकी दर्ज हैं और उनका लक्ष्य इस संख्या को 100 तक पहुंचाने का है। उनके अनुसार, प्रत्येक प्राथमिकी उनके लिए एक 'मेडल' है। उन्होंने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तक आंदोलन जारी रखने की बात भी कही।भारत में शांतिपूर्ण प्रदर्शन और असहमति लोकतांत्रिक अधिकारों के अभिन्न हिस्से हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी भी सरकारी परिसर में बिना अनुमति प्रवेश किया जा सकता है। आकाशवाणी भवन कोई सामान्य सार्वजनिक स्थल नहीं है। वहां प्रसारण से जुड़ी संवेदनशील गतिविधियां, तकनीकी सुविधाएं और सुरक्षा व्यवस्थाएं संचालित होती हैं।

राहुल गांधी पहले पुलिस बैरिकेड पर चढ़े और फिर आकाशवाणी भवन के प्रवेश द्वार की ओर बढ़े। वहां तैनात निजी सुरक्षा एजेंसी के कर्मचारियों ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन वे अंदर चले गए। यदि किसी संवेदनशील सरकारी प्रसारण परिसर में राजनीतिक नेता और उनके समर्थक बिना पूर्व अनुमति प्रवेश कर सकते हैं, तो प्रवेश नियंत्रण कितना प्रभावी है? यदि पुलिस बाहर भीड़ को नियंत्रित कर रही थी, तो परिसर के भीतर जाने का रास्ता कैसे खुला?आकाशवाणी यानी ऑल इंडिया रेडियो भारत की सार्वजनिक प्रसारण व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके परिसरों में स्टूडियो, तकनीकी उपकरण, नियंत्रण कक्ष और संचार सुविधाएं होती हैं। यहां से एक साथ करोड़ों लोगों तक सूचना पहुंचाई जा सकती है। इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से यह मानकर नहीं चला जा सकता कि परिसर में प्रवेश करने वाला प्रत्येक व्यक्ति केवल धरना देने आया है। यदि राहुल गांधी के साथ कोई असामाजिक तत्व या हिंसक समूह भी इसी तरीके से अंदर पहुंच जाता, तो स्थिति गंभीर हो सकती थी। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि कोई व्यक्ति स्टूडियो अथवा तकनीकी प्रसारण क्षेत्र तक पहुंच जाए, तो क्या वह राष्ट्रीय प्रसारण व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है?

इतिहास बताता है कि रेडियो और टेलीविजन केंद्र केवल सूचना देने वाले संस्थान नहीं रहे हैं। राजनीतिक संकटों, सैन्य तख्तापलटों और क्रांतियों के दौरान ये सत्ता तथा जनमत को प्रभावित करने वाले रणनीतिक केंद्र बन चुके हैं।वर्ष 1979 की ईरानी क्रांति इसका प्रमुख उदाहरण है। 11 फरवरी, 1979 को क्रांतिकारी समूहों ने रेडियो मुख्यालय पर नियंत्रण स्थापित किया। इससे तेहरान की रेडियो और टेलीविजन प्रसारण व्यवस्था पर उनका प्रभाव कायम हुआ। इससे पहले, 19 अगस्त, 1953 को प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देक के विरुद्ध तख्तापलट के दौरान भी रेडियो तेहरान पर नियंत्रण हासिल किया गया था। प्रसारण के माध्यम से सरकार के पतन की घोषणा की गई।मिस्र में 1952 के फ्री ऑफिसर्स आंदोलन के दौरान भी रेडियो की भूमिका महत्वपूर्ण रही। 23 जुलाई को राजशाही के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई के बाद रेडियो के माध्यम से जनता को बताया गया कि सेना ने सत्ता अपने हाथों में ले ली है। अनवर सादात ने रेडियो स्टूडियो से एक महत्वपूर्ण संदेश पढ़ा था।

रोमानिया की 1989 की क्रांति में भी राष्ट्रीय प्रसारण संस्थान संघर्ष के केंद्र बन गए थे। निकोलाए चाउशेस्कू का शासन गिरने के दौरान प्रदर्शनकारी रेडियो और टेलीविजन परिसरों तक पहुंच गए। टेलीविजन भवन विशेष रूप से संघर्ष का केंद्र बना और वहां से घटनाओं का प्रसारण शुरू हुआ।भारत ने आपातकाल, युद्ध, आतंकवाद, अलगाववाद और अनेक राजनीतिक संकटों का सामना किया है। ऐसे समय में सरकारी प्रसारण व्यवस्था की भूमिका सामान्य दिनों की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। कल्पना कीजिए कि कोई प्रदर्शनकारी समूह परिसर में धरना देने तक सीमित न रहे, बल्कि स्टूडियो या नियंत्रण कक्ष तक पहुंच जाए। वहां से कोई असत्यापित संदेश, आपातकालीन घोषणा अथवा प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, संसद, सेना या सरकार के संबंध में भ्रामक सूचना प्रसारित कर दी जाए। सरकारी आदेशों की अवहेलना या संस्थानों पर कब्जे का आह्वान भी किया जा सकता है। कुछ मिनट का ऐसा प्रसारण हजारों-लाखों लोगों में भ्रम और अफरातफरी पैदा कर सकता है।

राहुल गांधी देश के प्रमुख विपक्षी नेता हैं। विपक्ष लोकतंत्र का अनिवार्य स्तंभ है और उसे सरकार की नीतियों, निर्वाचन आयोग तथा अन्य संस्थाओं के कामकाज पर सवाल उठाने का पूरा अधिकार है। लेकिन सार्वजनिक जीवन में किसी नेता की भूमिका जितनी बड़ी होती है, उसके आचरण का प्रभाव भी उतना ही व्यापक होता है। जब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष स्वयं सुरक्षा अवरोध पार कर राष्ट्रीय प्रसारण संस्थान के परिसर में बैठता है, तो उसके राजनीतिक संदेश का व्यापक प्रभाव पड़ता है।

सवाल राहुल गांधी के राजनीतिक विचारों का नहीं, बल्कि संस्थागत सुरक्षा की सीमाओं और नियमों के पालन का है। लोकतंत्र में सरकार बदली जा सकती है, नीतियों का विरोध हो सकता है, निर्वाचन आयोग की आलोचना की जा सकती है और प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के विरुद्ध आंदोलन भी किया जा सकता है। लेकिन इन अधिकारों का प्रयोग करते समय राष्ट्रीय संस्थानों की सुरक्षा से समझौता नहीं होना चाहिए।लोकतंत्र केवल विरोध करने की स्वतंत्रता का नाम नहीं है। यह उन संस्थाओं की सुरक्षा का भी नाम है, जिनके कारण अभिव्यक्ति, चुनाव, सूचना और सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण संभव होता है। आकाशवाणी परिसर में हुआ धरना केवल एक दिन की राजनीतिक घटना मानकर नहीं छोड़ा जाना चाहिए। यह पुलिस, खुफिया एजेंसियों, प्रसारण संस्थानों और सभी राजनीतिक दलों के लिए सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा का अवसर है। प्रवेश नियंत्रण, सुरक्षाकर्मियों की जवाबदेही और संवेदनशील क्षेत्रों तक पहुंच के नियमों की जांच होनी चाहिए।

सुरक्षा एजेंसियों को यह देखना चाहिए कि प्रवेश द्वारों पर पहचान की जांच, भीड़ के प्रबंधन और आपात स्थिति में प्रतिक्रिया की व्यवस्था कितनी सक्षम है। ऐसी समीक्षा किसी राजनीतिक पक्ष को निशाना बनाने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य में किसी भी व्यक्ति या समूह द्वारा सुरक्षा घेरे के दुरुपयोग को रोकने के लिए होनी चाहिए। नियमों का पालन समान रूप से हो और उल्लंघन की स्थिति में कार्रवाई तथ्यों तथा कानून के आधार पर की जाए।सुरक्षा में संभावित चूक को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच दबा देना भविष्य में महंगा पड़ सकता है। लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा और राष्ट्रीय संस्थानों की सुरक्षा एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि सुदृढ़ लोकतंत्र के पूरक हैं।

आलोक मेहता

(लेखक पद्मश्री सम्मानित वरिष्ठ संपादक हैं।)

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