राजस्थान नगरीय निकाय चुनाव के 14 सितंबर 2026 को परिणाम आए। इनमें भाजपा प्रत्याशी को केवल 1 वोट मिलने वाला एक चुनाव परिणाम सुर्खियों में रहा और राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना। हर ओर इसकी चर्चा है, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि क्यों बनी? इसके पीछे की कहानी जानना जरूरी है।
दरअसल, राजस्थान के डीडवाना-कुचामन जिले के परबतसर नगर पालिका चुनाव में भाजपा उम्मीदवार कैलाश चंद्र को वार्ड नंबर 13 से मात्र 1 वोट मिला, जबकि कांग्रेस की हिना खानम को 376 और निर्दलीय प्रत्याशी रसीद खां को 195 वोट मिले। हिना खानम जीतकर पार्षद बनीं। ये तथ्य है।चूंकि मामला भाजपा प्रत्याशी का था, इसलिए 1 वोट मिलना सुर्खियां बना। यहां तक दावे किए गए कि खुद कैलाश चंद्र को उनके परिवार वालों ने वोट नहीं दिए। जबकि तथ्य यह है कि कैलाश चंद्र परबतसर नगर पालिका के मुस्लिम बाहुल्य वार्ड 13 के नहीं, बल्कि वार्ड नंबर 12 के निवासी हैं। ऐसे में उस वार्ड में उनका नाम तक नहीं है। भाजपा को जब मुस्लिम बाहुल्य वार्ड में कोई प्रत्याशी नहीं मिला तो कैलाश चंद्र को औपचारिकता के लिए मैदान में उतार दिया गया। परिणाम जो पहले से तय थे, वही सामने आए यानी हार।
अब चुनाव परिणाम के बाद ऐसा बताया जा रहा है कि मानो राजस्थान की परबतसर नगर पालिका में पूरे देश की जनता ने भाजपा के प्रधानमंत्री को हरा दिया हो। जबकि सत्य यह है कि मुस्लिम बहुल वार्ड में भाजपा को वहां के बहुसंख्यक मुस्लिम समुदाय ने सिरे से खारिज किया है। सोचने योग्य बात यह है कि मुस्लिम बाहुल्य वार्ड से भाजपा को कोई मुस्लिम प्रत्याशी क्यों नहीं मिला? मुस्लिम बाहुल्य वार्ड में भाजपा को सिर्फ 1 वोट मिलने का अर्थ क्या है? क्या यह कि जहां हिंदू नहीं हैं, वहां भाजपा साफ है? वह क्यों?क्योंकि भाजपा हिन्दुत्व की पताका लेकर आगे चलती है। भाजपा तुष्टिकरण की नहीं, बल्कि 'सबका साथ-सबका विकास और सबका प्रयास' की बात करती है। इसके बावजूद क्या इसे मुस्लिम समुदाय की भाजपा से नफरत माना जाना चाहिए?
मुद्दा यह भी है कि क्या परबतसर नगर पालिका का वार्ड 13 हमेशा से मुस्लिम बाहुल्य रहा होगा? ऐसा क्यों होता है कि देश में जहां भी मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या बढ़ती है, वहां से धीरे-धीरे हिन्दुओं का सफाया हो जाता है और हिन्दू पलायन के लिए मजबूर होता है?देश के किसी भी कोने में हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र से किसी भी राजनीतिक दल के मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव जीतते हैं, किन्तु जहां भी मुस्लिम समुदाय की आबादी बढ़ती है, वहां कभी कोई हिन्दू क्यों नहीं जीत पाता?दूसरी ओर, समय-समय पर यह नैरेटिव चलाया जाता है कि भाजपा मुस्लिमों को टिकट ही नहीं देती। ऐसे में इस पर भी विचार किया जाना चाहिए कि वार्ड का चुनाव भले ही बहुत छोटा है, लेकिन वहां भाजपा को कोई प्रत्याशी क्यों नहीं मिलता? फिर जब भाजपा का हिन्दू प्रत्याशी चुनाव में उतरता है तो 573 वोटों में से उसे केवल 1 वोट ही क्यों मिल पाता है?
गणितीय आकलन के अनुसार यह कुल मतदान का 0.1745 प्रतिशत है। ऐसे में इस परिणाम के गहरे निहितार्थ क्या माने जाने चाहिए?क्या समाज को इस पर विचार नहीं किया जाना चाहिए? क्योंकि इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण है डेमोग्राफी परिवर्तन। धीरे-धीरे हर ओर हो रहा डेमोग्राफी परिवर्तन बताता है कि समाज अस्थिरता की ओर बढ़ चला है। हिन्दू खतरे में है। यह कोई भाजपा का नारा नहीं है, बल्कि ऐसे चुनावी परिणाम स्पष्ट घोषणा करते हैं कि जहां भी हिन्दू जनसंख्या कम होगी, वहां से उनका अस्तित्व संकट में पड़ेगा।डेमोग्राफी परिवर्तन के संकट के उदाहरण के लिए आप कश्मीर देखिए, बंगाल, कैराना देखिए, शाहीन बाग, दिल्ली दंगा 2020 देखिए, मेवात, नूंह, हरियाणा देखिए। ज्यादा दूर जाइए तो मोपला, नोआखली और 1947 का डायरेक्ट एक्शन देखिए। दिल्ली के ब्रह्मपुरी और उत्तम नगर, रतलाम के सुराना गांव, इंदौर और जबलपुर के मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में हिन्दुओं के घरों पर 'यह मकान बिकाऊ है' के पोस्टर देखिए।
गणेश शोभायात्रा, श्रीरामनवमी शोभायात्रा और हिन्दू त्योहारों में मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में होने वाले पथराव को देखिए। विवादों को देखिए। ये सभी तथ्य बताते हैं कि डेमोग्राफी परिवर्तन का भारतीय समाज पर कैसा विपरीत असर पड़ता है।इन तथ्यों और संदर्भों को उद्धृत करने के पीछे मंतव्य यह नहीं है कि किसी से नफरत पाली जाए। किन्तु डेमोग्राफी परिवर्तन से हमारा सामाजिक ताना-बाना कैसे बिखरता है और कैसे अस्तित्व पर चुनौती खड़ी होती है, यह समझना आवश्यक है। इस पर समाज के मध्य चिंतन-मंथन होना चाहिए।

कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल
(लेखक साहित्यकार, स्तंभकार एवं पत्रकार हैं।)