भारत भूमि पर जन्मा और निवास करने वाला प्रत्येक नागरिक भारतवासी है। उसी तरह भारत भूमि पर आयोजित होने वाला प्रत्येक मेला स्वदेशी था और है। इन मेलों का आयोजन प्राचीनकाल से होता आ रहा है। मेलों के आयोजन का इतिहास अलग-अलग है, जो पौराणिक काल और हमारी वैदिक परंपराओं से जुड़ा है। इसीलिए दुनिया में भारत को मेलों और त्योहारों के देश के रूप में जाना-पहचाना जाता है।
इन मेलों के माध्यम से देश के विभिन्न समाज अपने खास पर्वों और त्योहारों पर मेलों का आयोजन कर इन सामाजिक पर्वों को प्रमुखता से मनाने के साथ अपने समाज के लोगों और अन्य समाजों को जोड़ने तथा सामाजिक समरसता बढ़ाने का कार्य करते हैं। विविधता में एकता का भाव साकार करने वाले इन स्वदेशी मेलों का आयोजन क्षेत्रीय, सामाजिक और राष्ट्रीय त्योहारों पर प्रमुखता से किया जाता है।हमारे देश में कुंभ मेलों का प्रारंभ चीनी यात्री ह्वेनसांग के भारत आगमन के समय के विवरण के अनुसार, 629-645 ईस्वी के दौरान राजा हर्षवर्धन के समय से प्रयागराज में हर पाँचवें वर्ष एक मेले और उत्सव के आयोजन के रूप में होता था।आधुनिक सांस्कृतिक और राजनीतिक स्वदेशी मेलों का प्रारंभ 19वीं शताब्दी से माना जाता है। भारत में राष्ट्रवाद और स्वदेशी भाव को बढ़ाने के लिए 1867 में नवगोपाल मित्र द्वारा हिंदू मेला (चैत्र मेला) प्रारंभ किया गया था।
इन मेलों की श्रृंखला में आज स्वदेशी मेले देश की राजधानी दिल्ली के प्रगति मैदान से लेकर विभिन्न प्रदेशों, तहसीलों, ग्राम पंचायतों और जिलों में प्रमुखता से आयोजित किए जा रहे हैं। ये मेले समाज को आर्थिक रूप से समृद्ध बनाने के साथ राष्ट्रीयता का भाव बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं। माननीय दत्तोपंत ठेंगड़ी जी के आर्थिक चिंतन और माननीय दीनदयाल उपाध्याय जी के अंत्योदय के विचार एवं उद्देश्य को भी साकार कर रहे हैं। वर्तमान में स्वदेशी के विचार और आर्थिक चिंतन को मजबूती देने के लिए माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के 'लोकल फॉर वोकल' के संदेश को भी ये स्वदेशी मेले आगे बढ़ा रहे हैं।
देश के प्रमुख राज्यों में विभिन्न समाजों के राष्ट्रीय त्योहारों के अवसर पर मेलों का आयोजन प्रमुखता से किया जाता है। कुंभ के मेले पूरी दुनिया में खासा महत्व और स्थान रखते हैं। बिहार के सोनपुर में आयोजित होने वाला पशु मेला, पंजाब में बैसाखी, तमिलनाडु में पोंगल, केरल में ओणम, असम में बिहू, बंगाल में दुर्गा पूजा और महाराष्ट्र में गणेश उत्सव के अवसर पर मेलों का आयोजन किया जाता है। दुर्गा पूजा के अवसर पर भी पूरे देश में स्वदेशी मेलों का आयोजन होता है।
ग्वालियर में 1905 से आयोजित किया जाने वाला मेला अपनी स्थापना के 121वें वर्ष में प्रवेश कर गया है। उसी परिसर में आयोजित स्वदेशी मेला इस श्रृंखला को आगे बढ़ा रहा है और परिसर को नई पहचान दिला रहा है। दुनिया के देशों की बनती-बिगड़ती अर्थव्यवस्था के बीच भारत भी आर्थिक रूप से सशक्त और समृद्ध राष्ट्र के रूप में पहचाना जाता है। वर्तमान में हमारा देश पीपीपी और जीडीपी की गणना के अनुसार दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में दुनिया के देशों को आर्थिक क्षेत्र में चुनौती दे रहा है।
स्वदेशी मेलों और त्योहारों के इस देश में वर्ष 1991 में माननीय दत्तोपंत ठेंगड़ी जी ने स्वदेशी जागरण मंच की स्थापना कर समाज को आर्थिक रूप से समृद्ध और सशक्त बनाने के साथ स्वदेशी का विचार दिया। स्वयं निर्मित विभिन्न हस्तकलाओं के क्षेत्र में निपुण और महारत हासिल रखने वाले कलाकारों द्वारा बनाए गए उत्पादों को इन मेलों में स्थान देकर उन्हें आर्थिक मजबूती प्रदान करने और नई पहचान दिलाने का कार्य भी किया गया है। स्वदेशी मेलों के माध्यम से उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिल रही है।
ये मेले स्वदेशी होने के साथ-साथ जिन जिलों और प्रदेशों में आयोजित किए जाते हैं, वहाँ अपने हाथों से छोटी-से-छोटी कलाकृतियाँ निर्मित करने वाले कारीगरों, कलाकारों, उद्यमियों और व्यवसायियों को आर्थिक मजबूती प्रदान करते हैं। ये मेले समाज को आर्थिक मजबूती प्रदान करने के साथ आत्मनिर्भर, आर्थिक रूप से सशक्त और समृद्ध भारत बनाने का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं। पूरे देश में स्वदेशी जागरण मंच द्वारा प्रतिवर्ष लगभग 100 से अधिक स्वदेशी मेले आयोजित किए जाते हैं। ये स्वदेशी मेले भारतीय अर्थव्यवस्था के पहियों को गति भी प्रदान करते हैं।
मुझे विश्वास है कि स्वदेशी जागरण मंच द्वारा लगाए जा रहे स्वदेशी मेले भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के साथ दुनिया में भारत को आर्थिक रूप से संपन्न राष्ट्रों की सूची में प्रथम स्थान पर स्थापित करने में सहयोगी रहेंगे।

आदेश शर्मा
(लेखक स्वदेशी जागरण मंच, मध्यभारत प्रांत के विचार प्रमुख हैं।)