संयुक्त राष्ट्र में मतदान के नतीजे अद्भुत हैं, जो बता रहे हैं कि दुनिया बदल रही है। प्रस्ताव के पक्ष में 164 देशों ने वोट डाला। अकेला विरोध संयुक्त राज्य अमेरिका का था। यह एक असामान्य जीत है। यह अफ्रीका और भारत के संघर्ष की जीत थी। ग्लोबल साउथ अपनी पहचान वापस पाने के लिए लड़ रहा है। यह उसी लंबी लड़ाई की बड़ी सफलता है। अफ्रीकी देशों के लिए यह केवल नक्शे की लकीरों का मामला न होकर वैचारिक आजादी की बड़ी लड़ाई है। यह संज्ञानात्मक न्याय है। नक्शा राजनीतिक सच्चाई का पहला सबूत होता है। अफ्रीका एक विशाल महाद्वीप है।
सदियों से दुनिया एक बहुत बड़े धोखे में रही है। यह धोखा किसी हथियार से नहीं दिया गया। यह धोखा एक नक्शे के जरिए दिया गया। बचपन से हम किताबों में दुनिया देखते आए हैं। डिजिटल युग में हम मोबाइल स्क्रीन पर भी नक्शा देखते हैं। यह नक्शा पूरी तरह से गलत है। यह बहुत भ्रामक है। पंद्रह सौ उनहत्तर में गेरार्डस मर्केटर ने एक नक्शा तैयार किया था। दुनिया इसे मर्केटर प्रोजेक्शन मानती है। समुद्री नाविकों के लिए यह नक्शा वरदान था। इससे उन्हें रास्ता खोजने में मदद मिलती थी। वे दिशाओं का पता आसानी से लगा लेते थे। इस पुराने नक्शे ने धरती के असली आकार को बिगाड़ दिया। इसमें यूरोपीय मानसिकता साफ झलकती थी। इसने उत्तरी ध्रुव के पास वाले पश्चिमी देशों को बहुत बड़ा दिखाया। इन्हें हम ग्लोबल नॉर्थ कहते हैं। नक्शे में ये देश अपने असली आकार से कई गुना बड़े दिखते हैं। दूसरी ओर, भूमध्य रेखा के पास बसे देशों को सिकोड़कर दिखाया गया। दक्षिणी गोलार्ध के देशों को भी बहुत छोटा कर दिया गया। इस नक्शे के जरिए एक बात मन में बैठा दी गई। दुनिया के एक बड़े हिस्से को एहसास कराया गया कि वे बहुत छोटे हैं। यह एक तरह की खामोश गुलामी थी। पश्चिमी देशों ने अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए इसे थोपा था।
4 सितंबर 2026 का दिन इतिहास में दर्ज हो गया है। यह एक सुनहरे अध्याय के रूप में याद रखा जाएगा। दुनिया ने पांच सौ साल पुराने झूठ को नकार दिया। संयुक्त राष्ट्र ने आखिरकार एक बड़ी सच्चाई को मान लिया। भूगोल केवल गणितीय समीकरणों का खेल नहीं है। यह हमारी असली पहचान से जुड़ा है। यह ताकत और आत्मसम्मान का मुद्दा है। संयुक्त राष्ट्र ने 'मानचित्र सुधारें' नाम का ऐतिहासिक प्रस्ताव पास किया। इस एक कदम ने बहुत बड़ा बदलाव ला दिया है। अफ्रीकी देशों और भारत ने दुनिया को साफ संदेश दिया है। ग्लोबल साउथ अब जाग चुका है। वे खुद को नजरिए से नहीं देखेंगे। पूरी दुनिया को उन्हें उनके असली रूप में देखना होगा।
प्रस्ताव अफ्रीकी देश टोगो ने पेश किया था और 55 सदस्यों वाले अफ्रीकी संघ ने इसका एकमत समर्थन किया। इस प्रस्ताव में दुनिया भर की सभी सरकारों, संस्थानों और डिजिटल मैप कंपनियों से पुराने मर्केटर नक्शे को कूड़ेदान में डालने की अपील की गई है। उसकी जगह इक्वल अर्थ वाले नक्शों को अपनाने की बात कही गई। यह एक बिल्कुल सटीक नक्शा है। इस नक्शे की खासियत इसकी सच्चाई है। इसमें हर देश का आकार बिल्कुल उतना ही दिखता है, जितना वह असलियत में है। हर महाद्वीप धरती पर मौजूद अपने वास्तविक आकार में नजर आता है। संयुक्त राष्ट्र में मतदान के नतीजे अद्भुत हैं, जो बता रहे हैं कि दुनिया बदल रही है। प्रस्ताव के पक्ष में 164 देशों ने वोट डाला। अकेला विरोध संयुक्त राज्य अमेरिका का था। यह एक असामान्य जीत है। यह अफ्रीका और भारत के संघर्ष की जीत थी। ग्लोबल साउथ अपनी पहचान वापस पाने के लिए लड़ रहा है। यह उसी लंबी लड़ाई की बड़ी सफलता है। अफ्रीकी देशों के लिए यह केवल नक्शे की लकीरों का मामला न होकर वैचारिक आजादी की बड़ी लड़ाई है। यह संज्ञानात्मक न्याय है। नक्शा राजनीतिक सच्चाई का पहला सबूत होता है। अफ्रीका एक विशाल महाद्वीप है। यह ग्रीनलैंड से 14 गुना बड़ा है। फिर भी नक्शे पर इसे ग्रीनलैंड के बराबर दिखाया जाता है। यह अफ्रीका की महानता, असीमित विशालता और ताकत का निरादर है। अफ्रीकी देशों ने इसे गरिमा वापस पाने का मौका माना। अमेरिका ने इसे समय की बर्बादी करार दिया। लेकिन जमीनी सच्चाई बिल्कुल अलग है। अफ्रीका महाद्वीप बहुत विशाल है। उसके अंदर पूरा अमेरिका और चीन आसानी से समा सकता है। पूरा भारत और यूरोप भी वहां समा सकता है।
इस ऐतिहासिक घटना में भारत की भूमिका शानदार रही है। ग्लोबल साउथ के पुनर्जागरण में भारत ने मार्गदर्शक की भूमिका निभाई है। भारत एक मजबूत स्तंभ बनकर उभरा है। यह प्रस्ताव अफ्रीकी संघ के झंडे तले पेश किया गया था, लेकिन कूटनीतिक जमीन तैयार करने का प्रयास भारत ने किया। भारत पिछले एक दशक से यह काम कर रहा है। यह पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महान सोच का हिस्सा और उनकी दूरदर्शी रणनीति का अभिन्न अंग है। उनका मकसद ग्लोबल साउथ को सम्मान दिलाना है। वे विश्व मंच पर उसकी आवाज बुलंद करना चाहते हैं। नरेंद्र मोदी का वैश्विक प्रभाव यहां साफ दिखाई देता है। भारत ने दुनिया के सामने खुद को विश्व बंधु के रूप में स्थापित किया है। भारत दुनिया का एक सच्चा मित्र है। भारत का मानना है कि सच्ची साझेदारी बराबरी से पनपती है। विकासशील और विकसित देश बराबरी के स्तर पर खड़े होने चाहिए। भारत ने अपनी जी20 अध्यक्षता के दौरान यही किया। प्रधानमंत्री मोदी के प्रयासों से बड़ा बदलाव आया। उनके कूटनीतिक कौशल से अफ्रीकी संघ जी20 का स्थायी सदस्य बना। नक्शा बदलने के प्रस्ताव का समर्थन उसी दिशा में एक कदम है। भारत ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। पश्चिमी भेदभाव को खत्म करना ही होगा। सुरक्षा परिषद से लेकर स्कूलों तक बदलाव जरूरी है। भारत और अफ्रीका नई राह तय कर रहे हैं। उनका आकार कोई पश्चिमी देश तय नहीं करेगा। वे अपनी पहचान खुद दुनिया के सामने रखेंगे।
इस सटीक नक्शे का सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव व्यापक होगा। आर्थिक असर भी दूरगामी होगा। सबसे बड़ा असर स्कूली बच्चों पर पड़ेगा। भारत और अफ्रीका के बच्चे भ्रामक नक्शे देखते आए हैं। नक्शों ने महसूस कराया कि पश्चिमी देश दुनिया के केंद्र हैं। अब हालात पूरी तरह बदलने वाले हैं। भारत और टोगो सरकारी स्कूलों में नए नक्शे शामिल करेंगे। बच्चे असली नक्शे में अपने देश को देखेंगे। सदियों पुरानी हीन भावना जड़ से खत्म होगी। मन में प्राचीन सभ्यता को लेकर गर्व पैदा होगा। यह ग्लोबल साउथ के लिए मानसिक पुनर्जागरण होगा।
इस नक्शे का असर अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। विदेशी निवेश पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ेगा। पश्चिमी निवेशक पुराने नक्शों पर भरोसा करते थे। वे ग्लोबल साउथ को आकार में छोटा समझते थे। अब कंपनियों का नजरिया बदलेगा। निवेशक भूमध्य रेखा के पास बसे देशों का असली आकार पहचानेंगे। भारत और अफ्रीका में अपार संभावनाएं नजर आएंगी। विशाल बाजार और युवा आबादी निवेश को आकर्षित करेगी। पश्चिमी देश सहायता देने का अहंकार छोड़ देंगे। वे हमारे साथ बराबरी की व्यापारिक साझेदारी करेंगे। तकनीकी कंपनियों के लिए यह बड़ी चुनौती है। डिजिटल कंपनियों पर दबाव बढ़ेगा। उन्हें नया नक्शा दिखाना होगा। इससे पश्चिमी देशों का वर्चस्व टूटेगा। रूस और कनाडा अपने असली आकार में नजर आएंगे। यूरोप एक छोटा हिस्सा लगेगा। ग्रीनलैंड मेक्सिको से बस थोड़ा बड़ा लगेगा। पश्चिमी देशों का यह सिकुड़ना उनके वर्चस्व के अंत का आरंभ है। यह इक्कीसवीं सदी की बहुत बड़ी घटना है। दुनिया में नए युग की शुरुआत हुई है। भारत और अफ्रीका इसका सफल नेतृत्व कर रहे हैं।

प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल
(लेखक आफ्रो-एशियाई दर्शन महासभा के अध्यक्ष एवं पूर्व कुलपति हैं।)