विजयादशमी के अवसर पर जब हमारी दृष्टि युद्धभूमि में आमने-सामने खड़े श्रीराम और रावण के चरित्र पर ठहरती है, तब विजय के वास्तविक अर्थ का एक विलक्षण पक्ष दिखाई देता है। एक ओर रावण की समस्त शक्तियाँ, उसका अपार वैभव और उसका पराक्रम है, तो दूसरी ओर श्रीराम का शील, उनकी मर्यादा और उनके चरित्र की उदात्तता। इस महासंग्राम में श्रीराम का सबसे बड़ा अस्त्र उनके हाथों में धारण किया हुआ धनुष नहीं, बल्कि उनके भीतर प्रतिष्ठित मर्यादा है। उनके चरित्र का वैशिष्ट्य इस बात में समाया है कि वे शत्रु की पराजय से अधिक उसकी शत्रुता की पराजय चाहते हैं। शत्रु को समाप्त कर देना मनुष्य के सामर्थ्य में हो सकता है, किंतु शत्रु की शत्रुता का अंत करना उसके चरित्र की उदात्तता का प्रमाण है। श्रीराम तो शत्रु के भीतर भी मनुष्य को देखते हैं। विरोध के उस पार भी उन्हें मानवीय अस्तित्व दिखाई देता है और उनकी महानता इसी में है कि वे शत्रु के विनाश से आगे बढ़कर उसके भीतर की शत्रुता के पराभव की कामना करते हैं। संभवतः इसी भाव ने उन्हें पुरुषों में उत्तम बनाया और इसी ने उनके नाम के साथ वह गौरवशाली संबोधन जोड़ा, जो युगों से भारतीय चेतना में श्रद्धापूर्वक गूँजता आया है ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’।
ऐसे ही राम के अनेक आदर्श भारत की चेतना में गहराई से बसे हुए हैं। भाषा के विद्वान कहते हैं कि ‘राम’ का अर्थ रमण करने वाला है, जो जन-जन के हृदय में रमते हैं और अपने गुणों से जीवन को रमणीय बनाते हैं। इसीलिए राम भारत की सांस्कृतिक चेतना में निरंतर विद्यमान हैं। उनके आदर्श भारत की सीमाओं में ही नहीं सिमटते, बल्कि उनकी चिंता में पूरा विश्व समाहित है। इसीलिए उनका एक नाम ‘विश्वम्भर’ भी है। उनका जन्म जिस रघुकुल में हुआ, उसकी परंपरा लोकमंगल, वचनपालन और धर्मरक्षा की रही है। महाराजा पृथु, राजा मान्धाता, राजा हरिश्चंद्र, महाराजा सगर, राजा दिलीप, राजा भगीरथ, राजा रघु और राजा अज से लेकर महाराज दशरथ तक ने अपने वचन की मर्यादा को जीवन से भी अधिक महत्त्व दिया। इसी परंपरा का निर्वाह श्रीराम ने वनगमन स्वीकार करके किया। पिता के वचन की रक्षा के लिए राजसुख का त्याग और वन में रहकर ऋषियों की रक्षा का संकल्प उनके चरित्र के ऐसे पक्ष हैं, जो बताते हैं कि समाज के हित के लिए अपने हित का परित्याग करना ही पड़ेगा।
विजयादशमी के अवसर पर राम और रामराज्य का स्मरण इसलिए भी आवश्यक है कि इससे हमें शासन और नेतृत्व के स्वरूप को समझने का अवसर मिलता है। शासन कैसा हो और राजधर्म का आधार क्या हो, इसका उत्तर रामराज्य की परिकल्पना में मिलता है। ऐसा शासन, जिसमें नागरिक को पता ही न चले कि उस पर कोई शासन भी कर रहा है। रामराज्य का मूल भाव यही है कि शासन का केंद्र शासक का वैभव नहीं, बल्कि जनसाधारण का कल्याण हो। रामकथा के अनेक लोकप्रचलित आख्यानों में पशु-पक्षियों तक की पुकार सुने जाने का भाव मिलता है। यह उस न्यायपूर्ण व्यवस्था की कल्पना है, जिसमें निर्बल की आवाज भी महत्त्व रखती है।
आज के राष्ट्रीय जीवन में श्रीराम के आदर्शों की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। विकसित भारत का संकल्प शिक्षा, विज्ञान, रोजगार और आर्थिक प्रगति के साथ सामाजिक न्याय तथा प्रत्येक नागरिक के सम्मान से भी जुड़ा है। समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास के अवसर पहुँचाना, युवाओं की प्रतिभा को सही दिशा देना, महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना और सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी को महत्त्व देना हमारे सामूहिक कर्तव्य हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की अंत्योदय की परिकल्पना का उत्कृष्ट उदाहरण यदि इतिहास में कहीं मिलता है, तो वह रामराज्य ही है। सत्ता-संचालन का मूल भाव रामराज्य में ही परिलक्षित होता है। राष्ट्र की प्रगति का लाभ समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचे और जनकल्याण शासन की प्राथमिकता बना रहे, यही रामराज्य और अंत्योदय की परिकल्पना का मूल भाव है।
श्रीराम का जीवन हमें यह भी सिखाता है कि बड़े लक्ष्य सामूहिक प्रयास, परस्पर विश्वास और अपने दायित्व के प्रति निष्ठा से ही प्राप्त किए जा सकते हैं। हनुमान की निष्ठा, विभीषण के निर्णय और वानर सेना के सामूहिक पराक्रम ने लंका विजय का मार्ग प्रशस्त किया। यह प्रसंग बताता है कि जब नेतृत्व के प्रति विश्वास, सही निर्णय लेने का साहस और सामूहिक प्रयास एक दिशा में आगे बढ़ते हैं, तब कठिन से कठिन लक्ष्य भी प्राप्त किए जा सकते हैं। यही भावना परिवार से लेकर समाज और राष्ट्र तक सभी को एक सूत्र में बाँधती है।विजयादशमी का पर्व हमें इसी व्यापक दृष्टि के साथ अपने जीवन और आचरण पर विचार करने का अवसर देता है। हर वर्ष रावण का पुतला जलाकर हम बुराई पर अच्छाई की विजय का उत्सव मनाते हैं, लेकिन इस विजय का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होगा, जब हम अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ और स्वार्थ पर भी विजय पाने का प्रयास करेंगे। श्रीराम की मर्यादा को अपने आचरण में उतारना, अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करना और समाज के हित को प्राथमिकता देना ही इस पर्व की सच्ची सार्थकता है।
आइए, इस विजयादशमी पर हम सत्य, संयम, कर्तव्यनिष्ठा और लोककल्याण के मूल्यों को अपने जीवन का आधार बनाने का संकल्प लें, ताकि श्रीराम के आदर्शों से प्रेरित होकर हम एक ऐसे समाज और राष्ट्र के निर्माण में योगदान दे सकें, जहाँ सबका कल्याण समाहित हो। हम सब मिलकर विकसित भारत के संकल्प को साकार करने के लिए सामूहिकता के साथ आगे बढ़ें। राष्ट्र और समाज की प्रगति को ही व्यक्तिगत प्रगति का आधार बनाएँ।

हेमंत खण्डेलवाल
(लेखक भाजपा मध्यप्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष व बैतूल विधायक हैं।)