प्रमोद शर्मा,हापुड़: इस बार सावन का तीसरा सोमवार श्रद्धालुओं के लिए बेहद खास रहने वाला है। नागपंचमी और श्रावण सोमवार का अद्भुत संयोग 17 अगस्त को बन रहा है। एक ही दिन भगवान शिव और नागदेवता की आराधना का अवसर मिलने से मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की तैयारियां शुरू हो गई हैं। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार यह संयोग धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
देवलोक कॉलोनी स्थित ज्योतिष कार्यालय के ज्योतिर्विद पंडित सुबोध पाण्डेय ने बताया कि वैदिक पंचांग के अनुसार श्रावण शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि 16 अगस्त की शाम 4 बजकर 53 मिनट से शुरू होकर 17 अगस्त सोमवार की शाम 4 बजकर 59 मिनट तक रहेगी। इस कारण 17 अगस्त को नागपंचमी का पर्व शास्त्रोक्त रूप से मनाया जाएगा। खास बात यह है कि इसी दिन सावन का तीसरा सोमवार भी है।
ज्योतिर्विद प्रीति पाण्डेय ने बताया कि नागपंचमी सोमवार को पड़ने के कारण भगवान शिव और नागदेवता की संयुक्त उपासना का विशेष महत्व है। सुबह स्नान के बाद सबसे पहले गणेशजी का स्मरण करें। इसके बाद शिवलिंग पर जल और दूध से अभिषेक कर बेलपत्र, धतूरा आदि श्रद्धानुसार अर्पित करें। इसके बाद नागदेवता का पूजन कर हल्दी, अक्षत, पुष्प, धूप-दीप और नैवेद्य अर्पित किया जा सकता है।
108 बार करें मंत्र जाप
नागदेवता की आराधना के दौरान ‘नागदेवताभ्यो नमः’ मंत्र का 108 बार जाप करना शुभ माना गया है। घर में नागदेवता की तस्वीर या प्रतिमा रखकर भी विधि-विधान से पूजा की जा सकती है।
राहु-केतु दोष वालों के लिए खास दिन
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार जिन लोगों की कुंडली में राहु-केतु से संबंधित दोष या कालसर्प दोष बताया गया है, वे इस दिन शिव पूजा, नागदेवता की प्रार्थना और जरूरतमंदों को दान कर सकते हैं। सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र, गुड़ और तिल का दान करने की सलाह दी गई है।
सुबह 6:04 से 8:39 बजे तक शुभ मुहूर्त
नागपंचमी पूजन का अत्यंत शुभ मुहूर्त 17 अगस्त सोमवार को सुबह 6:04 बजे से 8:39 बजे तक बताया गया है। श्रद्धालु इस अवधि में नागदेवता और भगवान शिव की विशेष पूजा कर सकते हैं।
आस्था के साथ जीवों की सुरक्षा भी जरूरी
ज्योतिर्विदों ने स्पष्ट किया कि नागपंचमी पर जीवित सांप को पकड़कर परेशान करना या उसके साथ प्रदर्शन करना उचित नहीं है। सांप के मुंह में दूध डालने से उसे नुकसान पहुंच सकता है, इसलिए पूजा प्रतीकात्मक रूप से ही करें। पर्व का संदेश केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि प्रकृति और सभी जीवों के प्रति सम्मान का भी है। श्रद्धालुओं से क्रोध, विवाद और अपशब्दों से बचने तथा दिखावे के बजाय श्रद्धा और सात्त्विकता के साथ पर्व मनाने की अपील की गई है।