बृजेश 'कबीर',हरदोई: राजनीति में सुर एक हों तो उसे संगठन कहते हैं और राग अलग-अलग निकलने लगें तो सोशल मीडिया पर वही चर्चा का विषय बन जाते हैं। इन दिनों भाजपा से जुड़े कुछ वर्तमान और पूर्व पदाधिकारियों तथा समर्थकों की सोशल मीडिया टिप्पणियां कुछ ऐसा ही दृश्य पेश कर रही हैं। कोई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन की ‘शक्ति की सप्तधारा’ समझा रहा है, कोई साफ लिख रहा है, इस बार कट्टर समर्थक भाजपा को वोट नहीं देगा। कोई नेतृत्व की चुप्पी को लेकर बेचैनी जता रहा है, तो कोई श्रीराम की मर्यादा के जरिए शायद हताश कार्यकर्ताओं को धैर्य का पाठ पढ़ा रहा है। यानी एक ही राजनीतिक परिवार में इन दिनों तालमेल ढूंढना थोड़ा मुश्किल है।
पहला सुर : ‘शक्ति की सप्तधारा’
भाजपा जिला उपाध्यक्ष प्रीतेश दीक्षित ने सोशल मीडिया संदेश के जरिए पार्टी का सकारात्मक और वैचारिक ’सुर’ सामने रखा। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘शक्ति की सप्तधारा’ के आधार पर विकसित भारत का रोडमैप बताते हुए लिखा, इन सात धाराओं को हर व्यक्ति को समझना चाहिए। उनके अनुसार ये धाराएं भारत की सामर्थ्य को नई गति और नई ऊंचाई देने वाली हैं। मतलब साफ- सरकार के विजन पर भरोसा रखिए, तस्वीर बड़ी है।
दूसरा सुर : ‘इस बार वोट नहीं देगा’
प्रीतेश दीक्षित की पोस्ट पर वैसे तो यूजर्स के की नकारात्मक प्रतिक्रियाएं ही अधिक दर्ज हुईं, पर अमित कुमार त्रिपाठी की टिप्पणी बिल्कुल अलग राग छेड़ती है। उन्होंने लिखा- इस बार यह कट्टर समर्थक वोट नहीं देगा बीजेपी को। एक वाक्य, लेकिन सियासी मायने लंबे। खासकर तब, जब यह टिप्पणी किसी सामान्य राजनीतिक आलोचक की नहीं बल्कि खुद को पार्टी के कट्टर समर्थक के रूप में देखने वाले व्यक्ति की नाराजगी का संकेत देती है।
तीसरा सुर : श्रीकृष्ण शास्त्री का तंज
पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष श्रीकृष्ण शास्त्री भी सोशल मीडिया पर अपने खास अंदाज में सरकार और संगठन के बचाव में सक्रिय नजर आते हैं। एक टिप्पणी में उन्होंने सवालिया अंदाज में लिखा- आपको लगता है, आजम को गृहमंत्री बनाकर अखिलेश यादव यूजीसी संकट से सवर्णों को मुक्त करेंगे? धन्य हो! पार्टी के पक्ष का सुर सामने रखती यह टिप्पणी कथित ’दिमागी नक्सलियों’ पर निशाना साधती है। लेकिन सोशल मीडिया की खासियत यही है, एक टिप्पणी के उत्तर में दूसरी तुरंत तैयार रहती है।
चौथा सुर : कब तक हिन्दू के नाम पर राजनीति?
श्यामू वाजपेई की प्रतिक्रिया ने बहस को दूसरी दिशा में मोड़ दिया। उन्होंने श्रीकृष्ण शास्त्री की टिप्पणी पर पलटकर सवाल किया- नहीं, भाजपा बिहार में 10 लाख मुस्लिम महिलाओं को ईद पर ईदी देकर क्या साबित करना चाहती थी? कब तक हिन्दूओं के नाम पर राजनीति करते रहोगे? यानी एक तरफ विपक्ष पर सवाल, तो दूसरी तरफ अपनी ही पार्टी की राजनीतिक रणनीति पर सवाल।
सुर बदला, मंच वही : मोदी से उम्मीदें, लेकिन ‘मौन’ पर नाराजगी
निवर्तमान भाजपा जिला उपाध्यक्ष/जिला कार्यसमिति सदस्य कर्मवीर सिंह चौहान (पूर्व महामंत्री हरदोई बार एसोसिएशन) का सुर इस पूरे सोशल मीडिया विमर्श में सबसे अलग है। उन्होंने 2014 के नरेंद्र मोदी की बेबाक भाषा शैली और उनकी लोकप्रियता का उल्लेख करते हुए लिखा, आज भी जनता को उनसे बहुत उम्मीदें हैं। लेकिन इसके बाद उन्होंने यूजीसी के नए नियमों, पदोन्नति में आरक्षण, अमेरिका की नीतियों और राम मंदिर से जुड़े आरोपों जैसे संवेदनशील मुद्दों पर प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया नहीं आने को लेकर सवाल खड़े किए। वह दर्ज करते हैं, जनता प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया चाहती थी और मोदी जी द्वारा इन मुद्दों पर मौन व्रत में चले जाने से जनता का धैर्य टूट गया।
पीएम की चुप्पी ने किया ’दिमागी नक्सली’ बनने को बाध्य
कर्मवीर सिंह चौहान ने पेपर लीक के मुद्दे पर जंतर-मंतर पर फूटे गुस्से का भी उल्लेख किया और लिखा, इसे चाहे जेन ज़ी कहें या प्रायोजित भीड़, प्रधानमंत्री की चुप्पी ने उसे ’दिमागी नक्सली’ बनने पर मजबूर किया, किन्तु वह सभी भारतीय हैं। यहां कर्मवीर का सुर पार्टी विरोध का नहीं, बल्कि ‘अपनों से ज्यादा अपेक्षा’ वाली नाराजगी का है।
छठा सुर : श्रीराम, वचन और मर्यादा
वहीं भाजपा जिला उपाध्यक्ष संदीप सिंह की पिछले दिनों से पोस्ट का ’फ्लेवर’ अलग दिख रहा। विपक्ष वाले वो संदीप, जो यूथ के मसलों पर सड़कें गरमाते दिखते थे, सत्ता में आने पर युवाओं को ’आध्यात्म’ की घुट्टी दे रहे हैं। राम के चरित्र, पराक्रम और सामर्थ्य की चर्चा कर रहे हैं। उससे परे राम की महानता का गूढ़ रहस्य बता रहें हैं, कुछ यूं कि सामर्थ्य से ऊपर वचन और मर्यादा को महत्व देने के कारण राम महान हैं।
फिर भी नहीं कर पा रहे हताश-नाराज कार्यकर्ताओं को ’बूस्टअप’
संदीप कैकेयी के वचन, राम को 14 वर्ष वनवास को कोट करते हुए बताते हैं, राम चाहते तो पराक्रम के बल पर परिस्थितियां बदल देते, लेकिन उन्होंने सत्ता, सुख और अधिकार से ऊपर पिता के वचन और रघुकुल की मर्यादा को रखा। अब इसे राजनीतिक संदर्भ में कौन किस तरह पढ़े, यह सोशल मीडिया की अपनी व्याख्या है। मगर हताश और नाराज कार्यकर्ताओं के बीच यह संदेश ‘सामर्थ्य हो तो भी मर्यादा मत छोड़िए’ का संदेश उनके भीतर तक जा रहा है, उनके समकक्ष प्रीतेश दीक्षित और जिनके निजाम में संदीप युवा मोर्चा के सरदार थे, दोनों की पोस्ट पर आई प्रतिक्रियाओं से लगता नहीं है।
और अंत में वही ‘विशेष मनःस्थिति’
श्रीकृष्ण शास्त्री की एक और टिप्पणी इस पूरे घटनाक्रम को जैसे अलग ही कोण दे देती है। उन्होंने लिखा- जब हम स्वयं को ‘कुछ’ मान लेते हैं और ‘समय’ उसका ‘भुगतान’ नहीं करता है तो हमारी एक ‘विशेष’ प्रकार की मनःस्थिति बन जाती है। उन्होंने आगे इस मनःस्थिति का उदाहरण राहुल और अखिलेश से जोड़ा और यह भी लिखा कि ऐसी स्थिति मेरी अथवा मेरे मित्र, किसी की भी हो सकती है। शास्त्री की टिप्पणी को यूजर्स अधिक समझ नहीं पाए, किस संदर्भ में थी और किसने इसे अपने ऊपर लिया। राजनीति में अक्सर कहने वाले से ज्यादा चर्चा उस बात की होती है जिसे सुनने वाला अपने ऊपर ले ले।
सुनासीर नाथ बाबा गुस्सा, इसलिए धंस रहा गंगा एक्सप्रेसवे
भाजपा के पूर्व महामंत्री और 2012 में बिलग्राम-मल्लावां विधानसभा सीट से पार्टी प्रत्याशी रहे अभय शंकर शुक्ला भी इन दिनों सरकार और संगठन पर चुटीली टिप्पणियां कर रहे हैं। उनकी हालिया सोशल मीडिया प्रतिक्रिया, ’सुनासीर नाथ बाबा गुस्सा हैं, इसलिए गंगा एक्सप्रेसवे धंस रहा है, जय भोलेनाथ’ खासी चर्चा में है और यूजर्स ने दिलचस्प टिप्पणियां की हैं।
संगठन की बहुरंगी अभिव्यक्ति या बेसुरे सुरों का ऑर्केस्ट्रा
इन तमाम टिप्पणियों को एक साथ रखकर देखें तो भाजपा से जुड़े सोशल मीडिया विमर्श में फिलहाल तस्वीर दिलचस्प है। एक तरफ ‘विकसित भारत’ और ‘शक्ति की सप्तधारा’ का आत्मविश्वास है, दूसरी तरफ समर्थकों की नाराजगी। कहीं विपक्ष पर तंज है तो कहीं भाजपा की रणनीति पर ही सवाल। कहीं नेतृत्व से जवाब मांगा जा रहा है तो कहीं श्रीराम की मर्यादा याद दिलाई जा रही है। कुल मिलाकर मंच एक है, मंचासीन भी लगभग अपने ही हैं, लेकिन सुर अलग-अलग। किसी का सुर राष्ट्र निर्माण पर है, किसी का हिन्दुत्व पर, किसी का नेतृत्व से सवाल पर और किसी का मर्यादा पर। अब इसे संगठन की बहुरंगी अभिव्यक्ति कहें या सोशल मीडिया पर बज रहा ‘बेसुरे सुरों का ऑर्केस्ट्रा’, फैसला पाठक करें।