MP Outsourced Employees: मध्य प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में दिन-रात मरीजों की सेवा में जुटे आउटसोर्स स्वास्थ्य कर्मचारियों के वेतन भुगतान को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है। शासन द्वारा निर्धारित श्रमिक दर के विपरीत राज्य के करीब 20 जिलों में कर्मचारियों को मनमाने तरीके से कम वेतन दिए जाने का दावा किया जा रहा है। मामला मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री तक पहुंचने के बाद अब इस पूरे मामले को लेकर प्रशासनिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है।
निर्धारित वेतन और भुगतान में अंतर
मध्य प्रदेश संविदा आउटसोर्स स्वास्थ्य कर्मचारी संघ के अनुसार, शासन के नियमानुसार कर्मचारियों को अर्द्धकुशल श्रमिक दर के तहत प्रति माह 13,571 रुपये मिलने चाहिए, लेकिन कटनी जिले में कर्मचारियों को 5,500 से 6,500 रुपये, उज्जैन में 7,650 रुपये है, सागर में करीब 8,000 रुपये, भोपाल के काटजू अस्पताल में 9,000 रुपये और जेपी अस्पताल में 10,840 रुपये वेतन मिलने की बात सामने आई है।
कब और कैसे हुई थी नियुक्ति?
कर्मचारी संघ के आंकड़ों के अनुसार, 2019 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के माध्यम से करीब ढाई हजार सपोर्ट स्टाफ कर्मचारियों को आउटसोर्स पर रखा गया था। इसके बाद वर्ष 2024-25 के दौरान कई आउटसोर्स एजेंसियों के जरिए करीब 18 हजार मल्टी टास्क वर्कर नियुक्त किए गए थे। ये सभी कर्मचारी जिला अस्पतालों से लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
सीबीआई जांच की मांग
वेतन में मनमाने अंतर के अलावा कर्मचारी संघ ने ईपीएफ की राशि में भी गड़बड़ी और अनियमितताओं की आशंका जताई है। संघ का कहना है कि जब एक ही प्रदेश और एक ही श्रेणी के तहत कर्मचारी काम कर रहे हैं, तो जिलों और एजेंसियों के आधार पर वेतन में इतना बड़ा अंतर क्यों है? इसे लेकर संघ ने पूरे मामले की सीबीआई जांच कराए जाने की मांग की है।
उठते सवाल
अब सवाल यह बना हुआ है कि शासन स्तर से एजेंसियों को प्रति कर्मचारी कितनी राशि जारी होती है, कर्मचारियों के बैंक खातों में वास्तविक रकम कितनी पहुंचती है और पीएफ के नाम पर कटने वाली राशि का पूरा रिकॉर्ड क्या कहता है? यह पूरी जांच के बाद ही वित्तीय खेल की असल तस्वीर सामने आ सकेगी।