बृजेश कबीर, हरदोई: राजनीति में प्रायः व्यक्ति की पहचान उसके पद से होती है। लेकिन कुछ यात्राएं ऐसी होती हैं, जिनका आरम्भ पद से नहीं, परिस्थितियों से होता है। प्रदीप कुमार ‘पीके वर्मा’ की राजनीतिक यात्रा को समझने के लिए उनके वर्तमान दायित्वों से अधिक जरूरी है उस किशोर को देखना, जिसने पिता के कोयले के कारोबार में हाथ बंटाते हुए जीवन की शुरुआती पाठशाला देखी।
कोयले से हीरे का रूपक
कोयले और हीरे के बीच की दूरी केवल पदार्थ की नहीं, समय और दबाव की भी होती है। प्रकृति के लंबे ताप और दबाव में कार्बन का एक रूप हीरे की चमक तक पहुंचता है। पीके वर्मा की कहानी भी कुछ-कुछ ऐसी ही है—सामान्य परिवार की पृष्ठभूमि, निरंतर संघर्ष, राजनीतिक असफलताएं, अनवरत प्रतीक्षा और खुद को लगातार तराशते रहने की जिद।
पत्थरों से भरा रास्ता
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने अपनी प्रसिद्ध कविता ‘वह तोड़ती पत्थर’ में श्रम और संघर्ष के उस चेहरे को दर्ज किया था, जो कठिनाई के सामने ठहरता नहीं। पीके की कथा किसी राजनीतिक चमत्कार की नहीं, बल्कि ‘चरैवेति-चरैवेति’ के उस सिद्धांत की है, जिसमें रास्ते के पत्थरों से शिकायत करने के बजाय उन्हें पार करने की कोशिश की जाती है।
ब्लॉक की सियासत से शुरू सफर
पीके वर्मा की सक्रिय राजनीतिक यात्रा 2005 में हरियावां ब्लॉक प्रमुख का चुनाव लड़ने के साथ आगे बढ़ी। हालांकि संगठन में उनकी भूमिका इससे पहले ही शुरू हो चुकी थी और 1994 में वह बूथ अध्यक्ष रहे। भाजपा ने 2007 में तत्कालीन हरियावां-बावन विधानसभा क्षेत्र से उन्हें प्रत्याशी बनाया। इसके बाद उन्हें जिला उपाध्यक्ष के रूप में संगठनात्मक दायित्व मिला। वर्ष 2012 में सांडी विधानसभा सीट से दावेदारी के क्रम में उन्होंने क्षेत्र के गांवों में व्यापक जनसंपर्क किया।
जब टिकट नहीं मिला
राजनीति की यात्रा सीधी रेखा नहीं होती। टिकट की दावेदारी और टिकट मिलने के बीच कई बार वर्षों की दूरी होती है। पीके वर्मा ने भी यह दूरी देखी। विधानसभा चुनाव 2017 और लोकसभा चुनाव 2019 में मजबूत दावेदारी के बावजूद उन्हें पार्टी का प्रत्याशी बनने का अवसर नहीं मिला। यहीं किसी राजनीतिक कार्यकर्ता की असली परीक्षा शुरू होती है—क्या वह टिकट न मिलने के बाद किनारे हो जाएगा या संगठन के साथ बना रहेगा?
नाउम्मीदी के बाद भी संगठन सिर-माथे
पीके वर्मा ने दूसरा रास्ता चुना। वह पार्टी के घोषित प्रत्याशियों के लिए सक्रिय रहे। उनकी यात्रा का यह संभवतः सबसे महत्वपूर्ण अध्याय है, क्योंकि राजनीति में जीत के बाद साथ खड़े रहना आसान है, लेकिन अपनी इच्छा पूरी न होने के बाद भी संगठन के साथ बने रहना अलग तरह का धैर्य मांगता है।
2015 में हाथ आई सांडी प्रमुखी, 20 में क्षेत्रीय मंत्री पद
वर्ष 2012 में उन्हें केंद्रीय सहकारी उपभोक्ता भंडार का चेयरमैन और 2013 में उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति आयोग का सदस्य बनाया गया। वर्ष 2015 के सांडी ब्लॉक प्रमुख चुनाव में अनुज वधु को निर्वाचित कराने में भी उनकी भूमिका रही। भाजपा ने 2020 में पीके वर्मा को अवध क्षेत्र का मंत्री बनाया। संगठनात्मक जिम्मेदारियों के साथ उनका राजनीतिक सफर लगातार आगे बढ़ता रहा।
परिवार से संगठन तक
वर्ष 2021 में उनकी सहधर्मिणी प्रेमावती ने बेसिक शिक्षा विभाग की सेवा से त्यागपत्र दिया और जिला पंचायत अध्यक्ष चुनी गईं। इसके बाद पीके वर्मा की राजनीतिक भूमिका भी व्यापक चर्चा में आई। विधानसभा चुनाव 2022 में बिसवां के प्रभारी सहित विभिन्न चुनावों में संगठनात्मक जिम्मेदारियां निभाते हुए वह लगातार पार्टी गतिविधियों में सक्रिय रहे। वर्ष 2022 से वह भाजपा अनुसूचित मोर्चा, अवध क्षेत्र के महामंत्री हैं और 2025 में राष्ट्रीय परिषद के सदस्य चुने गए। अब अवध क्षेत्र उपाध्यक्ष के दायित्व ने उनकी संगठनात्मक यात्रा में नया अध्याय जोड़ा है।
पदों से बड़ी है यात्रा
पीके वर्मा की इस यात्रा को केवल पदों की सीढ़ी मान लेना अधूरा पढ़ना होगा। इस कहानी में कोयले का कारोबार है, जहां किशोरावस्था में पिता के साथ काम करते हुए जीवन को नजदीक से देखा। सामान्य परिवार की सीमाएं हैं, चुनाव लड़ने की आकांक्षा है, टिकट न मिलने की निराशा है और फिर भी संगठन के साथ बने रहने का निर्णय है।
‘तोड़ती पत्थर’ वाली जिजीविषा
निराला की कविता का संघर्ष केवल पत्थर तोड़ने वाली स्त्री का श्रम नहीं, बल्कि उस मनुष्य की जिजीविषा भी है, जो परिस्थितियों के सामने टूटने से इनकार करता है। पीके वर्मा की यात्रा को भी इसी दृष्टि से देखा जा सकता है। संघर्ष मनुष्य को तराशता है। कोयला हीरा नहीं होता, लेकिन समय, ताप और दबाव उसे बदल देते हैं। संघर्ष भी शायद मनुष्य के साथ यही करता है। वह हर किसी को चमकदार नहीं बनाता, लेकिन जो परिस्थितियों के दबाव में बिखरने के बजाय खुद को परिमार्जित करता रहे, उसकी पहचान धीरे-धीरे उसके पदों से नहीं, उसकी यात्रा से बनने लगती है।
पहचान पद से नहीं, सफर से
आज भाजपा में पीके वर्मा की जो पहचान है, उसके पीछे केवल राजनीतिक उपलब्धियां नहीं, बल्कि वह लंबा समय भी है, जिसमें उन्होंने प्रतीक्षा की, निराशा को झेला और फिर भी सक्रियता नहीं छोड़ी। उनकी कहानी किसी नेता के महिमामंडन की नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की कथा है, जिसने जीवन से इतना ही सीखा—पत्थर रास्ते में हों तो उन्हें देखकर रुकना नहीं और कोयले से शुरुआत हो तो चमकने का सपना छोड़ना नहीं।
पीके वर्मा और प्रेमावती के शिल्पकार निरक्षर राजाराम-रामकली
पीके वर्मा के पिता राजाराम और माता रामकली निरक्षर थे। नुमाइश चौराहा पर पुराने बोर्डिंग हाउस के बाहर कोयले के कारोबार संग कपड़ों पर इस्त्री कर परिवार का जीवन चलाते थे। पिता के सहयोग में पीके ने प्रेस की मूठ जरूर पकड़ी, लेकिन मां ने बेटे की पकड़ कलम पर ढीली नहीं पड़ने दी। शिक्षा के साथ संस्कारों की नींव भी मजबूत की।
वर्ष 1985 में जब पीके इंटरमीडिएट में थे, तब मां ने मल्लावां की हाईस्कूल उत्तीर्ण प्रेमावती को बहू बनाकर घर की जिम्मेदारी सौंप दी। पीके आगे की पढ़ाई के लिए लखनऊ चले गए। इधर सास रामकली ने बहू की शिक्षा का बीड़ा उठाया। उन्होंने प्रेमावती को आगे पढ़ने के लिए प्रेरित किया। एमए-बीएड कराया, सिविल और बैंक सेवाओं की तैयारी कराई और बीटीसी भी कराया। बाद में प्रेमावती बेसिक शिक्षा विभाग में सेवा में आ गईं।

पीके वर्मा वर्ष 1990 में इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर लौटे, लेकिन कुछ समय बाद दिल्ली की ट्रेन पकड़ ली। वहां कॉरपोरेट सेक्टर के कामकाज को समझा और बड़े कारोबारों को संचालित करने का अनुभव प्राप्त किया। वर्ष 1994 में वह सब कुछ छोड़कर लौट आए। यहां सुशील चन्द्र त्रिवेदी ‘मधुपेश’ के एनजीओ से बतौर सलाहकार जुड़े और दिल्ली से उनकी दूरी फिर स्थायी हो गई। दो वर्ष बाद वह बेसिक शिक्षा विभाग में बतौर इंजीनियर सर्व शिक्षा अभियान से जुड़े। एक दशक बाद सरकारी सेवा को छोड़कर पूरी तरह राजनीति का रास्ता चुना। पीके वर्मा और प्रेमावती अपनी उपलब्धियों का श्रेय अपने गोलोकवासी माता-पिता राजाराम और रामकली के संस्कारों और आशीर्वाद को देते हैं।