बांग्लादेश में जिन्ना के खिलाफ विरोध

जिन्ना की फोटो को लेकर क्यों भड़का बांग्लादेश

बांग्लादेश में, मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीरों को लेकर उग्र विरोध हो रहा है, जिसमें छात्रों ने उनकी तस्वीरें फाड़ी और अपमानित की।

By : नरेंद्र कुमार
जिन्ना की फोटो को लेकर क्यों भड़का बांग्लादेश

संग्रहालय के नवीनीकरण के बाद वहां जिन्ना की तीन तस्वीरें लगाई गईं। इनमें 21 मार्च 1948 को तत्कालीन रेसकोर्स मैदान, जो आज सोहरावर्दी उद्यान है, में दिए गए भाषण की तस्वीर भी थी। उसी भाषण में जिन्ना ने कहा था कि पाकिस्तान की राज्य भाषा केवल उर्दू होगी। बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की एकल तस्वीरें वहां प्रमुख रूप से नहीं रखी गईं। खबर फैलते ही आलोचना शुरू हुई। उर्दू विभाग के छात्र अबू तैय्यब हाबिलदार संग्रहालय गए, तस्वीरें फाड़ दीं और कहा कि जिस व्यक्ति ने मातृभाषा के विरुद्ध फैसला दिया तथा 1948 में कर्जन हॉल परिसर में छात्रों के दमन से जुड़ा रहा, उसका स्थान इस संग्रहालय में नहीं हो सकता। छात्रदल, छात्र संघ और छात्र फेडरेशन ने भी विरोध दर्ज कराया।

बांग्लादेश के युवा इन दिनों मोहम्मद अली जिन्ना के नाम पर फिर उबल रहे हैं। उनकी फोटो फाड़ी गई, उस पर थूका गया और बाद में उसे फर्श पर बिछाकर कुचला गया। ढाका विश्वविद्यालय के छात्र संघ संग्रहालय में उनकी तस्वीरें लगते ही परिसर में विरोध फूट पड़ा। अब सवाल यह भी है कि जिन्ना के इस सार्वजनिक अपमान से बांग्लादेश के पाकिस्तान से संबंध प्रभावित होंगे या नहीं। फिलहाल यह घटना कूटनीति से अधिक स्मृति और घरेलू राजनीति की लड़ाई लगती है। फिर भी इतिहास में ऐसी प्रतीकात्मक घटनाएं अक्सर दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद दूरी को और साफ कर देती हैं।

जिन्ना के खिलाफ यह गुस्सा किसी एक फ्रेम का नहीं था। इसकी जड़ 1948 के उस फैसले में है, जब जिन्ना ने कहा था कि पाकिस्तान की राज्य भाषा केवल उर्दू होगी। पूर्वी पाकिस्तान की बहुसंख्यक जनता की मातृभाषा बंगाली थी। उसी घोषणा से भाषा आंदोलन निकला और वही आंदोलन बाद में स्वतंत्र बांग्लादेश की पहचान का हिस्सा बना।

संग्रहालय में क्या हुआ

संग्रहालय के नवीनीकरण के बाद वहां जिन्ना की तीन तस्वीरें लगाई गईं। इनमें 21 मार्च 1948 को तत्कालीन रेसकोर्स मैदान, जो आज सोहरावर्दी उद्यान है, में दिए गए भाषण की तस्वीर भी थी। उसी भाषण में जिन्ना ने कहा था कि पाकिस्तान की राज्य भाषा केवल उर्दू होगी। बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की एकल तस्वीरें वहां प्रमुख रूप से नहीं रखी गईं। खबर फैलते ही आलोचना शुरू हुई। उर्दू विभाग के छात्र अबू तैय्यब हाबिलदार संग्रहालय गए, तस्वीरें फाड़ दीं और कहा कि जिस व्यक्ति ने मातृभाषा के विरुद्ध फैसला दिया तथा 1948 में कर्जन हॉल परिसर में छात्रों के दमन से जुड़ा रहा, उसका स्थान इस संग्रहालय में नहीं हो सकता। छात्रदल, छात्र संघ और छात्र फेडरेशन ने भी विरोध दर्ज कराया। कुछ छात्रों ने जिन्ना की तस्वीरें फर्श पर रखकर उनका तिरस्कार किया। जिन्ना की फोटो लगाने का विरोध देश के बाकी हिस्सों में भी हो रहा है।

उर्दू पर पूर्वी बंगाल का विरोध

पाकिस्तान बने कुछ महीने ही हुए थे, जब मार्च 1948 में जिन्ना पूर्वी बंगाल आए। 21 मार्च को सार्वजनिक सभा में और 24 मार्च को ढाका विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में उन्होंने साफ कहा कि राज्य की भाषा उर्दू ही होगी। उनका तर्क था कि प्रांत अपने कामकाज के लिए बंगाली चुन सकता है, लेकिन पूरे देश को जोड़ने वाली भाषा एक होनी चाहिए और वह उर्दू है। उन्होंने उर्दू को इस्लामी संस्कृति और मुस्लिम परंपरा से जोड़ा तथा विरोध करने वालों को पाकिस्तान का दुश्मन और देश की एकता तोड़ने वाला बताया। छात्रों ने तुरंत नारे लगाए- 'मानी ना, मानी ना', अर्थात हम नहीं मानते। उसी दौर में छात्रों के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात में भी जिन्ना अपनी बात पर अड़े रहे।

उर्दू पश्चिमी पाकिस्तान के कई हिस्सों में संपर्क भाषा थी, पर पूर्वी पाकिस्तान की बहुसंख्यक आबादी बंगाली बोलती थी। 1947 में नए पाकिस्तान की आधी से अधिक आबादी बंगाली भाषी थी। भाषा केवल बोलचाल नहीं थी। वह शिक्षा, नौकरी, साहित्य और सत्ता से जुड़ी थी। इसलिए केवल उर्दू को राज्य भाषा बनाना पूर्वी हिस्से को सांस्कृतिक और प्रशासनिक रूप से पीछे धकेलने जैसा लगता था।

भाषा आंदोलन से 1971 तक

1952 के भाषा आंदोलन में रफीक, सलाम, बरकत, जब्बार जैसे युवा मारे गए। उनकी शहादत के कारण 21 फरवरी बाद में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस बना। 1956 के संविधान में बंगाली को भी राज्य भाषा का दर्जा मिला, पर विश्वास का घाव पहले ही गहरा चुका था। भाषा का असंतोष धीरे-धीरे राजनीतिक अलगाव बना और 1971 के मुक्ति युद्ध तक पहुंचा। बांग्लादेश की आधिकारिक स्मृति में इस युद्ध में तीस लाख लोगों की शहादत का उल्लेख किया जाता है।आज का विरोध उसी स्मृति से जुड़ा है। विरोध करने वाले कहते हैं कि बांग्लादेश उस मिट्टी पर बना, जहां सलाम और बरकत ने भाषा के लिए खून दिया। उन्हें जिन्ना को संग्रहालय में सम्मानजनक जगह देना उस इतिहास का अपमान लगता है।

तो क्या बांग्लादेश ने जिन्ना को माफ नहीं किया? इस सवाल का सरल उत्तर यह है कि बांग्लादेश की मुख्यधारा ने जिन्ना की उर्दू-केंद्रित नीति को आज भी स्वीकार नहीं किया। युवा पीढ़ी उन्हें प्रायः बंगाली विरोधी शासक के रूप में देखती है। कुछ लोग उन्हें उपमहाद्वीप के मुस्लिम राजनीतिक इतिहास का हिस्सा भी मानते हैं, जिसे पूरी तरह मिटाया नहीं जा सकता। अंतर यह है कि स्मृति में जगह देना और नायक बनाना एक बात नहीं है।

इतिहास में माफी निजी भावना से अधिक

सामूहिक स्मृति का विषय होती है। कर्जन हॉल और सोहरावर्दी उद्यान अब भी 1948 के विरोध की याद दिलाते हैं। जब उसी विरासत वाले परिसर में 1948 वाले भाषण की तस्वीर बिना उस विरोध की कथा के लगाई जाती है, तो तस्वीर व्यक्ति की नहीं रहती। वह एक अस्वीकृत नीति का प्रतीक बन जाती है।इस बीच, पाकिस्तान के लिए जिन्ना राष्ट्रपिता हैं। उनकी तस्वीर पर थूकना या पैर रखना इस्लामाबाद की आधिकारिक स्मृति में गहरी चोट माना जाएगा। वहां की सरकार, मीडिया और राजनीतिक दल इसे बांग्लादेश की 'ऐतिहासिक दुश्मनी' का नया प्रमाण बता सकते हैं। इससे दोनों देशों के बीच पहले से कमजोर सांस्कृतिक आदान-प्रदान और नरम छवि और कमजोर पड़ सकती है।

बांग्लादेश की तरफ असर उलटा होगा। वहां की मुख्यधारा, खासकर युवा और मुक्ति युद्ध की स्मृति से जुड़े समूह, पाकिस्तान से किसी भावुक मेल-मिलाप को पहले भी संदेह से देखते रहे हैं। 1971 का युद्ध, माफी न मिलने का आरोप और भाषा आंदोलन की याद अभी जीवित है। ऐसे में जिन्ना का सार्वजनिक तिरस्कार घरेलू राजनीति में यह संदेश देगा कि ढाका इस्लामाबाद के संस्थापक की कथा को अपना इतिहास नहीं मानता।

राष्ट्र अपनी जटिल जड़ों को पूरी तरह काट नहीं सकते। पर संग्रहालय, पाठ्यपुस्तक और छात्र राजनीति यह तय करते हैं कि अतीत किस संतुलन से दिखाया जाए। जिन्ना की तस्वीर को लेकर उठा बवाल यही बताता है कि बांग्लादेश अभी उस भाषा-नीति को भूला नहीं है। इतिहास यहां बंद किताब नहीं, जीवित बहस है और यही बहस उसके पड़ोसी संबंधों की सीमा भी तय करती है।

विवेक शुक्ला

(लेखक इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के पूर्व सलाहकार हैं।)

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