बैंकिंग में जवाबदेही का दीप जलाने का संकल्प

लक्ष्मी पूजन, बही-खाता और बैंकिंग की साख

लेख में बैंकिंग क्षेत्र के राजनीतिक हस्तक्षेप, एनपीए और घोटालों की चुनौतियों का उल्लेख करते हुए जवाबदेही, पारदर्शिता और जनता के धन की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात कही गई है।

By : नरेंद्र कुमार
लक्ष्मी पूजन, बही-खाता और बैंकिंग की साख

राहुल गांधी इन दिनों मोदी सरकार और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पर अनर्गल आरोप लगाकर जनता को भ्रमित कर रहे हैं। वे कभी अंबानी-अडानी का नाम लेकर आरोप लगाते हैं। वे भूल जाते हैं कि कांग्रेस राज में 'टाटा-बिड़ला' की सरकार कहलाने के साथ ही राजीव गांधी से लेकर मनमोहन सिंह के शासनकाल के दौरान अंबानी-अडानी भी आगे बढ़े हैं।

दीपावली का पर्व आते ही देश के व्यापारिक प्रतिष्ठानों, दुकानों और घरों में परंपरा जीवंत हो उठती है। व्यापारी नए बही-खातों की पूजा करते हैं, लक्ष्मी-गणेश की आराधना होती है और समृद्धि की कामना की जाती है। लेकिन बैंकिंग व्यवस्था की ओर देखते ही सवाल उठता है। क्या सरकारी और निजी बैंकों ने इन मूल्यों का पालन किया है? क्या जनता की मेहनत की कमाई से बने बैंकों को राजनीतिक हस्तक्षेप, उद्योगपतियों, भ्रष्ट अधिकारियों और कमजोर प्रबंधन से बचाया जा सका है?

आईडीबीआई बैंक के रणनीतिक विनिवेश को लेकर राहुल गांधी की कांग्रेस और कम्युनिस्ट विचारधारा वाले दलों की आपत्तियाँ सामने आ रही हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के नेतृत्व में केंद्र सरकार बैंक के नियंत्रण और स्वामित्व में बदलाव की प्रक्रिया आगे बढ़ा रही है। सवाल उठाने वालों को बताना चाहिए कि जिन सरकारी बैंकों को राष्ट्रीय गौरव और सामाजिक न्याय का माध्यम बताया गया, उनकी आर्थिक सेहत बिगड़ने, हजारों करोड़ रुपये के कर्ज डूबने और राजनीतिक संरक्षण में कर्ज बाँटने की परिस्थितियाँ कैसे पैदा हुईं? बैंक सरकारी हो या निजी, असली सवाल उसके मालिक का नहीं, बल्कि जवाबदेही, पारदर्शिता, वित्तीय अनुशासन और जनता के पैसे की सुरक्षा का है। कई बड़े सेठ, ठेकेदार और जमींदार गरीबों को अधिक ब्याज पर कर्ज देकर उनका शोषण करते थे। सार्वजनिक बैंक बने तो नेताओं ने अपने ढंग से गरीबों और ईमानदार लोगों का पैसा लूटा।

जब नरेंद्र मोदी सरकार 2014 में सत्ता में आई, तब बैंकों के फँसे हुए कर्ज यानी गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) का संकट था। रिजर्व बैंक की एसेट क्वालिटी रिव्यू के बाद पुराने खराब ऋण बड़े पैमाने पर सामने आए। मोदी सरकार ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी), 2016 लागू की, जिसका उद्देश्य दिवालिया कंपनियों के समाधान और ऋण वसूली को समयबद्ध बनाना था। 2015 में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इंद्रधनुष योजना घोषित की। इसमें नियुक्तियों, बैंक बोर्ड ब्यूरो, पूँजी उपलब्ध कराने और बैंकिंग प्रशासन में सुधार पर जोर दिया गया था। बैंकिंग क्षेत्र में निरंतर निगरानी और जवाबदेही भी जरूरी है।

राहुल गांधी इन दिनों मोदी सरकार और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पर अनर्गल आरोप लगाकर जनता को भ्रमित कर रहे हैं। वे कभी अंबानी-अडानी का नाम लेकर आरोप लगाते हैं। वे भूल जाते हैं कि कांग्रेस राज में 'टाटा-बिड़ला' की सरकार कहलाने के साथ ही राजीव गांधी से लेकर मनमोहन सिंह के शासनकाल के दौरान अंबानी-अडानी भी आगे बढ़े हैं। मोदी ने टाटा, बिड़ला, अंबानी, अडानी और मित्तल जैसे घरानों को प्रोत्साहित किया, ताकि उद्योग-व्यापार के साथ रोजगार के अधिकाधिक अवसर मिलें। राहुल गांधी एंड कंपनी इन तथ्यों को भी ध्यान में रखे।

19 जुलाई 1969 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने 14 प्रमुख निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों तक बैंकिंग पहुँचाना, किसानों और छोटे उद्योगों को ऋण देना तथा बड़े औद्योगिक घरानों के प्रभाव को सीमित करना बताया गया था। बैंकों की शाखाएँ गाँवों और कस्बों तक पहुँचीं। मैं 1971 से दिल्ली में पत्रकारिता कर रहा हूँ और बैंक या कोयला खानों के राष्ट्रीयकरण के लाभ तथा बाद के नुकसानों यानी घोटालों पर जमीनी रिपोर्टिंग और लेख लिखता रहा हूँ। कई वित्त मंत्रियों के साक्षात्कार भी करता रहा हूँ।

राष्ट्रीयकरण के केवल दो वर्ष बाद, 1971 में नागरवाला कांड ने देश की बैंकिंग और राजनीतिक व्यवस्था को हिला दिया। 24 मई को दिल्ली स्थित स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की संसद मार्ग शाखा से 60 लाख रुपये निकलवाए गए।मुख्य कैशियर वेद प्रकाश मल्होत्रा को कथित तौर पर फोन पर प्रधानमंत्री कार्यालय के पी.एन. हक्सर और स्वयं इंदिरा गांधी के नाम का हवाला दिया गया। बाद में पता चला कि फोन करने वाला रुस्तम सोहराब नागरवाला था। अधिकांश राशि बरामद हुई और नागरवाला गिरफ्तार हुआ। लेकिन मामला धोखाधड़ी तक सीमित नहीं रहा। प्रधानमंत्री कार्यालय का नाम, बैंक की आंतरिक प्रक्रियाएँ और पुलिस जाँच की विश्वसनीयता पर सवाल उठे। न्यायमूर्ति जे. जगनमोहन रेड्डी आयोग ने पुलिस जाँच की कमियों की ओर ध्यान दिलाया और कई प्रश्न अनुत्तरित रहे।

सरकारी व्यवस्था का खेल समझने वाले यशवंत सिन्हा चंद्रशेखर की कुछ महीनों तक चली कांग्रेस-समर्थित सरकार में वित्त मंत्री बने। फिर कांग्रेस के नरसिम्हा राव के कार्यकाल में मनमोहन सिंह ने उस मसौदे को उदारवादी नीति के रूप में लागू करना शुरू किया। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में यशवंत सिन्हा फिर जोड़-तोड़ कर वित्त मंत्री बनने में सफल हुए। उनके कार्यकाल में 2001 का शेयर बाजार संकट और यूनिट ट्रस्ट ऑफ इंडिया (यूटीआई) का यूएस-64 संकट बड़ी चुनौतियाँ बने। इसी दौर में केतन पारेख का शेयर बाजार घोटाला सामने आया। बैंकों, सहकारी बैंकों, कंपनियों और शेयर दलालों के संदिग्ध वित्तीय लेन-देन की जाँच हुई। संसदीय संयुक्त समिति ने 2002 में रिपोर्ट पेश की। समिति ने केतन पारेख को प्रमुख खिलाड़ी माना और यूटीआई प्रबंधन तथा वित्त मंत्रालय की निगरानी संबंधी कमियों पर सवाल उठाए। सरकार किसी भी पार्टी की हो, वित्त मंत्रालय और नियामक संस्थाओं की जिम्मेदारी वित्तीय संकट के संकेतों पर समय रहते कार्रवाई करना है।

फारूक अब्दुल्ला का नाम जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन के धन के कथित दुरुपयोग के मामले में आया। एसोसिएशन को 2002 से 2011 के बीच बीसीसीआई से लगभग 113 करोड़ रुपये मिले थे। सीबीआई ने 43.69 करोड़ रुपये के कथित गबन का आरोप लगाया। 2018 में फारूक अब्दुल्ला सहित चार व्यक्तियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल हुआ। इसमें एसोसिएशन के पदाधिकारियों के साथ जम्मू-कश्मीर बैंक की खनयार शाखा के एक अधिकारी का नाम भी था। यह बैंक के अपने धन का कथित घोटाला नहीं, बल्कि क्रिकेट एसोसिएशन के धन के कथित गबन का मामला था, जिसमें बैंक खातों और अधिकारी की भूमिका जाँच के दायरे में आई।

सरकारी बैंकों की बड़ी समस्या उनके शीर्ष प्रबंधन की नियुक्तियों और निर्णय प्रक्रिया में सरकारी प्रभाव को लेकर रही है। अध्यक्ष, प्रबंध निदेशक और निदेशक मंडल के सदस्यों के लिए वित्तीय विशेषज्ञता, बैंकिंग अनुभव, जोखिम प्रबंधन और स्वतंत्र निर्णय क्षमता जरूरी है। नियुक्तियों में राजनीतिक नजदीकी, प्रशासनिक पसंद या व्यक्तिगत संबंधों को प्राथमिकता मिले तो संस्थागत स्वतंत्रता कमजोर होती है। शायद इसीलिए मोदी सरकार ने कई बैंकों में निदेशक नियुक्त नहीं किए।

दीपावली पर व्यापारी पुराने बही-खातों का हिसाब करते हैं। लक्ष्मी पूजन पर देश को संकल्प लेना चाहिए कि बैंकिंग व्यवस्था में न राजनीतिक सिफारिश चलेगी, न उद्योगपतियों का दबाव और न भ्रष्ट अधिकारियों की मनमानी। सरकारी बैंक हों या निजी, सबके लिए समान वित्तीय अनुशासन होना चाहिए। बैंक का धन जनता का विश्वास है। उसे बचाना सरकार, रिजर्व बैंक, बैंक प्रबंधन और राजनीतिक दलों सभी की जिम्मेदारी है। दीपावली की असली लक्ष्मी वही है, जो ईमानदारी से अर्जित हो, सुरक्षित रहे और देश की आर्थिक समृद्धि में योगदान दे। बही-खाते में केवल लाभ नहीं, जवाबदेही का हिसाब भी साफ होना चाहिए।

आलोक मेहता

(लेखक पद्मश्री सम्मानित वरिष्ठ संपादक हैं।)

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