दिसंबर 2001 में नई दिल्ली स्थित भारतीय संसद पर पाकिस्तानपरस्त आतंकवादियों ने हमला किया था। इसे स्वतंत्र भारत की बड़ी आतंकी घटनाओं में गिना जाता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने पाकिस्तान के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई करने और आतंकवादी शिविरों को नष्ट करने के विकल्पों पर विचार किया। कांग्रेस सहित अन्य दलों ने सरकार के साथ खड़े होने की घोषणा की, लेकिन वामदलों ने सैन्य कार्रवाई के बजाय कूटनीतिक दबाव से समस्या का समाधान करने की सलाह दी थी।
वामपंथ लंबे समय से हिंदुत्व का विरोध करता रहा है। लेखक का तर्क है कि राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस पर भी पिछले कुछ वर्षों से वामपंथी विचारधारा का प्रभाव बढ़ा है। चुनावी राजनीति में वामदलों का प्रभाव घटा है और लोकसभा में उनकी संख्या दहाई से नीचे पहुँच गई है। इसके बावजूद अकादमिक जगत, मीडिया और अन्य क्षेत्रों में उनके वैचारिक समर्थक तथा संगठित नेटवर्क मौजूद हैं। लेखक के अनुसार, चुनावी राजनीति में सीमित संभावनाओं के कारण वामपंथी कांग्रेस और राहुल गांधी के निकट आए हैं। राहुल गांधी के बयानों और राजनीतिक आचरण में इसकी झलक दिखाई देती है।
लोकतंत्र में आलोचना आवश्यक है, लेकिन उसमें संयम और मर्यादा भी होनी चाहिए। राहुल गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा के दौरान महाराष्ट्र में स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के विरुद्ध आपत्तिजनक बयान दिए और उन्हें देशद्रोही तक कहा, जबकि उनकी दादी इंदिरा गांधी ने सावरकर की प्रशंसा की थी। लेखक का मानना है कि केंद्र सरकार की आलोचना करने के उद्देश्य से निकाली गई यात्रा में सावरकर को निशाना बनाना अनावश्यक था, क्योंकि महाराष्ट्र में एक बड़ा वर्ग उन्हें अपना आदर्श मानता है।राहुल गांधी बार-बार कहते हैं कि उनकी लड़ाई सत्ता की नहीं, बल्कि विचारधारा की है। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा सरसंघचालक मोहन भागवत भी उनके निशाने पर रहते हैं। लेखक इसे वामपंथी राजनीतिक शैली से जोड़ते हैं, जिसमें वैचारिक विरोध के दौरान भाषा की कटुता बढ़ जाती है। राजनीतिक आलोचना का उद्देश्य नीतियों और निर्णयों पर प्रश्न उठाना होना चाहिए, न कि संवाद को व्यक्तिगत कटुता में बदल देना।
लेख में दिल्ली के जंतर-मंतर पर जेन-जी प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी और वामपंथी छात्र नेताओं की मुलाकात का भी उल्लेख है। लेखक के अनुसार, इसके बाद राहुल गांधी ने विश्वविद्यालयों और अन्य संस्थाओं पर संघ परिवार के कथित कब्जे का आरोप लगाया। यह घटनाक्रम कांग्रेस की राजनीतिक दिशा और उसके वैचारिक संबंधों पर सवाल खड़े करता है।वंदे मातरम् के संपूर्ण गायन के प्रश्न पर भी कांग्रेस का रुख असंगत दिखाई देने का आरोप लगाया गया है। लेख के अनुसार, वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने आरंभ में पूरे वंदे मातरम् को अपनाने की बात कही, लेकिन बाद में कांग्रेस ने ऐतिहासिक संदर्भों का हवाला देकर इसके संपूर्ण गायन को स्वीकार नहीं किया। ऐसे मुद्दों पर स्पष्ट रुख अपनाना किसी राष्ट्रीय राजनीतिक दल के लिए आवश्यक है।
लेख में 30 सितंबर को दुबई से तेल अवीव जा रहे विमान में भारतीय पायलट स्मित मच्छार पर ओमानी सह-पायलट द्वारा कथित हमले का भी उल्लेख है। बताया गया कि स्मित ने यात्रियों की सुरक्षा के लिए साहस दिखाया। वे हमले के समय हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित अनेक लोगों ने उनके साहस की प्रशंसा की। लेखक के अनुसार, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी उनकी सराहना की, लेकिन राहुल गांधी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। लेखक इसे कांग्रेस के हिंदू धार्मिक प्रतीकों के प्रति बदलते रवैये से जोड़ते हैं। हालाँकि, किसी एक प्रतिक्रिया या मौन के आधार पर किसी नेता की मंशा निश्चित रूप से तय नहीं की जा सकती।
लेखक 1930 के दशक का संदर्भ देते हुए कहते हैं कि कम्युनिस्टों ने उस समय कांग्रेस के भीतर अपना प्रभाव बढ़ाने का प्रयास किया था। गांधीवादी विचारधारा से मतभेद होने पर उन्होंने कांग्रेस को बुर्जुआ कहकर उसकी आलोचना की। इससे स्पष्ट होता है कि कांग्रेस और वामपंथ के संबंध हमेशा सहज नहीं रहे हैं।भाजपा जॉर्ज सोरोस और उनसे जुड़े संगठनों पर भारत में अस्थिरता पैदा करने के प्रयासों का आरोप लगाती रही है। सलिल शेट्टी ओपन सोसाइटी फाउंडेशंस के उपाध्यक्ष रह चुके हैं। 31 अक्टूबर 2022 को वे कर्नाटक में राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में शामिल हुए थे। इसकी तस्वीरें सार्वजनिक हुई थीं। 2023 में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने भी इस आधार पर राहुल गांधी से सवाल किए थे। हालाँकि, किसी व्यक्ति की उपस्थिति या पूर्व पद मात्र से राजनीतिक मिलीभगत सिद्ध नहीं होती।
कांग्रेस को अपनी मूल विचारधारा और राष्ट्रीय राजनीतिक भूमिका पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। विपक्ष का दायित्व सरकार की नीतियों की आलोचना करना है, लेकिन यह आलोचना तथ्यों, मर्यादा और राष्ट्रीय हितों के अनुरूप होनी चाहिए। यदि कांग्रेस अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान के बजाय वामपंथी विचारधारा के प्रभाव में चलती है, तो मुख्यधारा की राजनीति से उसका विचलन बढ़ सकता है। यह स्थिति कांग्रेस और देश के लोकतांत्रिक विमर्श, दोनों के लिए नुकसानदेह हो सकती है।

(लेखक पत्रकार, इतिहासकार एवं साहित्यकार हैं।)