गांधीवादियों का गांधीवाद पर प्रहार

गांधीवादियों द्वारा गांधी के अवमूल्यन का दौर

समकालीन गांधीवादियों ने गांधीवाद के मूल सिद्धांतों की उपेक्षा करते हुए अपने व्यवहार और भाषा से गांधीवाद का अवमूल्यन कर दिया है।

By : नरेंद्र कुमार
गांधीवादियों द्वारा गांधी के अवमूल्यन का दौर

पूरे घटनाक्रम पर दृष्टि डालें। नीट पेपर लीक की सूचना सामने आई, सरकार ने संज्ञान लिया। परीक्षा रद्द हुई। अपराधियों के विरुद्ध कार्रवाई हुई। बाद में शिक्षा मंत्री ने इस्तीफा दिया और शिक्षा सुधार से संबंधित नए कानून को संसद की स्वीकृति भी मिली। इस पूरे घटनाक्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने ऐसा क्या किया, जिसके लिए उन्हें इस प्रकार कठघरे में खड़ा किया जाए?

रिकाधीश का एक नाम 'रणछोड़' भी है। हम सब जानते हैं कि व्यापक जनहित में कई बार लोकनायकों को भी अपने कदम पीछे खींचने पड़ते हैं। लगातार हो रहे आक्रमणों से प्रजा की रक्षा के लिए भगवान कृष्ण ने मथुरा छोड़कर द्वारका का मार्ग अपनाया था। महात्मा गांधी ने भी जनहित में एकाधिक बार अपने आंदोलनों को वापस लिया था। स्पष्ट है कि सत्ता के पास अपेक्षाकृत अधिक सूचनाएँ होती हैं और उन्हीं के आधार पर उसे निर्णय लेने पड़ते हैं। नीट पेपर लीक से जुड़े विवाद और कथित 'जेन-जी आंदोलन' को भी इसी दृष्टि से देखा जा सकता है। बौद्धिक वर्ग अन्य आंदोलनों की तरह इसकी भी अपनी-अपनी तरह से व्याख्या कर रहा है। दुर्भाग्य यह है कि इन व्याख्याओं में तथ्यपरक विश्लेषण कम और वैचारिक आग्रह अधिक दिखाई देता है।

इस पूरे प्रकरण में सबसे अधिक चिंताजनक बात यह रही कि स्वयं को गांधीवादी कहने वाले अनेक लोगों ने भी अपशब्दों और भद्दी गालियों तक को उचित ठहराने का प्रयास किया। हालिया जंतर-मंतर प्रकरण में सार्वजनिक रूप से जिस प्रकार अभद्र भाषा का प्रयोग हुआ, उसे कई तथाकथित गांधीवादियों ने भी न्यायोचित बताने की कोशिश की। यह सबसे अधिक क्षोभ उत्पन्न करने वाला पक्ष है। ऐसे लोगों ने गांधी-विचार को जितनी क्षति पहुँचाई है, उसकी भरपाई निकट भविष्य में संभव प्रतीत नहीं होती। गांधीवाद को समझने का सबसे सहज माध्यम गांधीवादियों की वाणी और उनका आचरण माना जाता रहा है। किंतु यह कैसा गांधीवाद है, जिसमें सत्य, अहिंसा और संयम को छोड़कर गाली-गलौज और कटु भाषा का समर्थन किया जा रहा है? यहाँ तक कि गांधी शांति प्रतिष्ठान जैसे संस्थान से जुड़े लोग भी इसका समर्थन करते दिखाई दिए। हाल ही में एक गांधीवादी ने कथित जेन-जी को संबोधित अपने पत्रनुमा लेख में लिखा, 'धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा एक आदमी का इस्तीफा नहीं है, सत्ता के अहंकार के टूटने की गूंज है। वह टूटा, यह अच्छा हुआ। लेकिन तुम याद रखना कि चोट खाया साँप ज्यादा खतरनाक होता है। राष्ट्र जब भीड़ में बदल दिया जाता है, तब वह हत्यारा हो उठता है, जिसे राष्ट्रवाद का नाम दिया जाता है।'

क्या किसी गांधीवादी से ऐसी भाषा की अपेक्षा की जा सकती है? यहाँ सीधे-सीधे सरकार अथवा प्रधानमंत्री के लिए 'साँप' जैसे शब्द का प्रयोग किया गया है। उस सरकार ने, जिसने शिक्षा व्यवस्था में आवश्यक सुधार किए, अपेक्षित न होते हुए भी अपने मंत्री का इस्तीफा लिया और स्वयं तथा अपनी दिवंगत माता के विरुद्ध की गई अभद्र टिप्पणियों पर भी संयम बनाए रखा। क्या ऐसे आचरण की तुलना 'साँप' से की जा सकती है? क्या गांधी कभी इस प्रकार की असत्य, अप्रिय और अनावश्यक भाषा का प्रयोग करते? जिस गांधी ने कम बोलने और आत्मसंयम के लिए सप्ताह में एक दिन मौन व्रत रखा, उनके अनुयायी होने का दावा करने वाले यदि ऐसी भाषा बोलें, तो उसे क्या कहा जाए?

सवाल केवल एक लेख का नहीं है। अनेक स्वयंभू गांधीवादियों ने इस पूरे घटनाक्रम में गांधीवाद की ऐसी व्याख्या प्रस्तुत की कि यदि आज गांधी होते, तो संभवतः स्वयं अत्यंत व्यथित होते। मूल प्रश्न एक पेपर लीक का था। परीक्षा रद्द हुई, पुनः आयोजित हुई, परिणाम आए और छात्रों ने मेरिट के आधार पर प्रवेश भी प्राप्त कर लिया। किंतु इस बहाने जिस प्रकार अनेक चर्चित लोगों ने अपनी कुंठा प्रकट की, वह चिंताजनक है। लोकतांत्रिक राजनीति में लगातार पराजय ने मानो उनके वैचारिक आवरण को उतार दिया। ऐसा प्रतीत हुआ कि वे गांधीवाद के नाम पर अश्लीलता और आक्रामकता को भी वैध ठहराना चाहते हैं। दूसरी ओर, लेखक के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने धैर्य, सहनशीलता और संयम का परिचय दिया, जिससे ऐसे प्रयास सफल नहीं हो सके।

पूरे घटनाक्रम पर दृष्टि डालें। नीट पेपर लीक की सूचना सामने आई। सरकार ने संज्ञान लिया। परीक्षा रद्द हुई। अपराधियों के विरुद्ध कार्रवाई हुई। बाद में शिक्षा मंत्री ने इस्तीफा दिया और शिक्षा सुधार से संबंधित नए कानून को संसद की स्वीकृति भी मिली। इस पूरे घटनाक्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने ऐसा क्या किया, जिसके लिए उन्हें इस प्रकार कठघरे में खड़ा किया जाए? विभिन्न तकनीकी माध्यमों और जाँचों के आधार पर यह भी कहा गया कि अभद्र भाषा का प्रयोग करने वाले अधिकांश लोग न तो छात्र थे और न ही कथित जेन-जी के प्रतिनिधि। अनेक लोगों की पृष्ठभूमि संदिग्ध बताई गई और न्यायालय ने भी कार्रवाई के निर्देश दिए। इसके बावजूद प्रधानमंत्री ने छात्रों से संवाद करते हुए उन्हें क्षमा करने की बात कही। यदि ऐसा है, तो क्या यह व्यवहार गांधीवादी मूल्यों के अधिक निकट नहीं माना जाएगा? इसके विपरीत, यदि गांधीवाद के नाम पर गाली-गलौज और विद्रोह को प्रोत्साहित किया जाए तथा युवाओं से कहा जाए कि 'हर घर में एक-एक प्रधान छिपा है, जिससे लड़ना है', तो क्या इसे गांधीवाद कहा जा सकता है?

छात्रों के जीवन को केवल आँकड़ों से नहीं आँका जा सकता, किंतु सामाजिक अध्ययन बिना आँकड़ों के भी संभव नहीं है। हाल के दिनों में यह कहा गया कि नीट परीक्षा दोबारा होने के कारण कुछ छात्रों ने आत्महत्या कर ली। निस्संदेह किसी भी छात्र का इस प्रकार जाना अत्यंत दुखद है। किंतु क्या यह निष्कर्ष उचित है कि केवल पुनर्परीक्षा ही इसका कारण थी? जिस परीक्षा में लगभग 95 प्रतिशत अभ्यर्थियों का चयन नहीं होना होता और जहाँ अधिकांश विद्यार्थी अनेक प्रयासों की मानसिक तैयारी के साथ बैठते हैं, वहाँ ऐसी घटनाओं के पीछे व्यापक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारणों की भी पड़ताल आवश्यक है। विशेषकर अभिभावकों की अपेक्षाओं का दबाव, असफलता का भय और मानसिक स्वास्थ्य जैसे प्रश्न गंभीर अध्ययन की मांग करते हैं। इन घटनाओं को इस प्रकार प्रस्तुत करना भी उचित नहीं कि छात्रों में भ्रम और निराशा और अधिक बढ़े।

इसी प्रकार, देश के विभिन्न राज्यों में विभिन्न सरकारों के कार्यकाल में पेपर लीक और भर्ती घोटालों के अनेक उदाहरण रहे हैं। बिहार में भर्ती घोटालों से जुड़े गंभीर आरोप सामने आए थे। छत्तीसगढ़ में लोक सेवा आयोग से जुड़े विवादों में तत्कालीन अध्यक्ष सहित अनेक लोगों को जेल जाना पड़ा। झारखंड सहित अन्य राज्यों में भी ऐसे अनेक मामले सामने आए। किंतु लेखक का प्रश्न यह है कि उन घटनाओं पर आज मुखर दिखाई देने वाले अनेक गांधीवादी तब मौन क्यों रहे? यदि एक कथित पेपर लीक को आधार बनाकर समाज में विभाजन, कटुता और हिंसक भाषा को वैध ठहराया जाए, तो यह गांधीवाद की मूल भावना के विपरीत प्रतीत होता है।

लेखक के मत में इस पूरे प्रकरण में शासन ने अपेक्षाकृत अधिक संयम, धैर्य और शालीनता का परिचय दिया। लगातार उकसावे के बावजूद यदि उसने अहिंसक और संयमित आचरण अपनाया, तो यह गांधीवादी मूल्यों के अधिक निकट माना जा सकता है। इसके विपरीत, अनेक पेशेवर गांधीवादियों ने अपने वक्तव्यों और व्यवहार से निराश किया। लेखक का मत है कि यदि आज महात्मा गांधी जीवित होते, तो संभवतः वे ऐसे गांधीवादियों के विरुद्ध ही अनशन पर बैठ जाते। जंतर-मंतर के हालिया घटनाक्रम के अनेक राजनीतिक और सामाजिक अर्थ निकाले जा सकते हैं, किंतु लेखक के अनुसार सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि स्वयं गांधीवादियों ने ही गांधीवाद का अवमूल्यन कर दिया।

यदि भारत अपनी इस नैतिक पहचान को खो देता है, तो यह देश के लिए गहरी क्षति होगी। जिन लोगों से समाज को सबसे अधिक संयम, संवाद और नैतिक नेतृत्व की अपेक्षा थी, उन्होंने ही उसे निराश किया। ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि प्रदान करे।

पंकज झा

(लेखक छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार हैं)

 

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