जनसमर्थन का अभाव आरोप को गलत सिद्ध नहीं करता, जैसे रैली की भीड़ किसी दावे को सही नहीं बनाती। लेकिन तेरह करोड़ मतदाताओं के अधिकार छिनने के दावे के लिए ठोस प्रमाण चाहिए। गड़बड़ी कहां हुई, कितने पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए और उनके अधिकार बहाल करने के लिए क्या किया जा रहा है, विपक्ष को बताना होगा।
सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग के हलफनामे ने उठाए नए सवाल। राहुल गांधी की रामलीला मैदान रैली के जवाब में भाजपा ने उतारे मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री।तेरह करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने का दावा विपक्ष की राजनीति का केंद्रीय मुद्दा है, लेकिन सवाल है कि इस कथित अन्याय के विरोध में देशभर में अपेक्षित जनाक्रोश क्यों नहीं दिखता? राहुल गांधी और विपक्षी दल विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को मताधिकार पर हमला बताकर चुनाव आयोग पर लोकतंत्र कमजोर करने का आरोप लगा रहे हैं। आरोपों की गंभीरता के साथ प्रमाणों की विश्वसनीयता भी जरूरी है।
जनसमर्थन का अभाव आरोप को गलत सिद्ध नहीं करता, जैसे रैली की भीड़ किसी दावे को सही नहीं बनाती। लेकिन तेरह करोड़ मतदाताओं के अधिकार छिनने के दावे के लिए ठोस प्रमाण चाहिए। गड़बड़ी कहां हुई, कितने पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए और उनके अधिकार बहाल करने के लिए क्या किया जा रहा है, विपक्ष को बताना होगा।
चुनाव आयोग का हलफनामा और उठते सवाल
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा है कि एसआईआर से संबंधित तीन प्रमुख आदेश मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की सर्वसम्मति से जारी किए गए थे। ये आदेश 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 को जारी किए गए। आयोग का पक्ष उन समाचार रिपोर्टों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, जिनमें दावा किया गया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने अन्य आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद निर्णय लिए।
आयोग के अनुसार, फाइलों पर दर्ज टिप्पणियां और आंतरिक विचार-विमर्श अंतिम निर्णय नहीं होते। निर्णय निर्धारित प्रक्रिया और आवश्यक अनुमोदन के बाद लिए जाते हैं। हलफनामे में यह भी कहा गया है कि कार्य-विभाजन संबंधी एक आंतरिक आदेश पर आयुक्तों ने आपत्ति की थी, लेकिन उसे लागू नहीं किया गया। आयोग का तर्क है कि इसे एसआईआर के प्रमुख आदेशों पर असहमति का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
यहां दो बातें अलग-अलग समझना आवश्यक है। पहली, आयोग ने हलफनामे में क्या पक्ष रखा है; दूसरी, न्यायालय उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर क्या निष्कर्ष निकालता है। हलफनामा आयोग का आधिकारिक जवाब है, न्यायालय का अंतिम निर्णय नहीं। इसलिए न इसे सभी सवालों का अंतिम उत्तर मानना उचित है, न आरोपों को बिना परीक्षण के सत्य घोषित करना।
मतदाता सूची की शुद्धता और अधिकार
मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक आवश्यक प्रक्रिया है। इसमें मृत व्यक्तियों के नाम हटाना, दोहरी प्रविष्टियों की पहचान करना और स्थानांतरित लोगों के विवरण सुधारना शामिल है। लेकिन किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से हटना गंभीर चूक है। दोनों स्थितियों में अंतर करना जरूरी है।
आयोग की जिम्मेदारी सूची को त्रुटिरहित बनाने के साथ-साथ प्रत्येक पात्र नागरिक का मताधिकार सुरक्षित रखना भी है। गलत तरीके से नाम हटने पर शिकायत का त्वरित समाधान होना चाहिए। विपक्ष संबंधित क्षेत्रों, मामलों की संख्या और प्रमाणों के साथ अपनी बात रखे, ताकि समस्या की व्यापकता स्पष्ट हो सके।
आयोग ने कहा है कि फॉर्म-6 में संशोधन नहीं किया गया और एसआईआर में इस्तेमाल किए जा रहे अतिरिक्त घोषणा-पत्र को उससे अलग बताया है। इस विवाद का समाधान वास्तविक प्रपत्रों, निर्धारित नियमों और उनके व्यावहारिक उपयोग की जांच से ही संभव है। किसी प्रक्रिया को केवल उसके नाम या आशंका के आधार पर सही अथवा गलत नहीं ठहराया जा सकता। नागरिकों के अधिकार राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई की मांग करते हैं।
समाचार रिपोर्ट और न्यायिक प्रमाण
समाचार माध्यमों का दायित्व संस्थाओं से सवाल पूछना, निर्णयों की पड़ताल करना और महत्वपूर्ण जानकारियां सामने लाना है। रिपोर्ट जांच का आधार बन सकती है, लेकिन उसमें सामने आई जानकारी और न्यायिक रूप से स्थापित तथ्य एक समान नहीं होते।यदि किसी रिपोर्ट में चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद की बात कही गई है, तो उसका परीक्षण संबंधित दस्तावेजों और आधिकारिक जवाबों के आधार पर होना चाहिए। आयोग का हलफनामा भी जांच से परे नहीं है। स्वतंत्र पड़ताल और न्यायिक परीक्षण ही विवाद की वास्तविक स्थिति स्पष्ट कर सकते हैं। न समाचार रिपोर्टों को बिना जांच के अंतिम सत्य मानना उचित है, न संस्थागत जवाब को सवालों से ऊपर रखना।
राहुल गांधी की राजनीति और कांग्रेस की चुनौती
राहुल गांधी एक नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली करने जा रहे हैं। कांग्रेस और सहयोगी दल एसआईआर के विरोध को लोकतंत्र बचाने की लड़ाई बता रहे हैं और इसे देशव्यापी आंदोलन बनाना चाहते हैं। इसकी सफलता नारों और भीड़ से नहीं, बल्कि प्रमाणों और मतदाताओं की समस्याओं के समाधान के उपायों से तय होगी।
कांग्रेस के सामने आंतरिक लोकतंत्र की चुनौती भी है। मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरू की राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका रही, लेकिन स्वतंत्रता के बाद पार्टी का नेतृत्व बार-बार नेहरू-गांधी परिवार के आसपास केंद्रित हुआ। ऐसे में राहुल गांधी की लोकतंत्र संबंधी दलीलों के साथ उनकी पार्टी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है। राजनीतिक विरासत अवसर दे सकती है, लेकिन विश्वसनीयता जनता के विश्वास से ही मिलती है।
भाजपा का जवाब और लोकतंत्र की कसौटी
कांग्रेस की रैली के जवाब में भाजपा भी देशव्यापी अभियान की तैयारी कर रही है। पार्टी पदयात्राओं और जनजागरण कार्यक्रमों के माध्यम से अपना पक्ष रखेगी। एक नवंबर को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लखनऊ में कार्यक्रम करेंगे। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह तथा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सहित अन्य नेताओं की भागीदारी की भी योजना है। भाजपा ने अभियान को 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' नाम दिया है।
इस राजनीतिक मुकाबले में दोनों पक्षों के दावों की कसौटी तथ्य होने चाहिए। विपक्ष को आरोपों के प्रमाण देने होंगे और भाजपा को भी केवल राजनीतिक प्रतिवाद से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। चुनाव आयोग के कामकाज पर उठे सवालों का जवाब पारदर्शिता और तथ्यों के आधार पर दिया जाना चाहिए। संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता किसी एक दल की संपत्ति नहीं, बल्कि लोकतंत्र की साझा पूंजी है।
अंततः इस विवाद के केंद्र में कोई राजनीतिक दल या नेता नहीं, बल्कि आम मतदाता है। उसका नाम सूची में होना चाहिए, मताधिकार सुरक्षित रहना चाहिए और शिकायत का समय पर समाधान होना चाहिए। यदि कहीं गड़बड़ी है, तो जांच होनी चाहिए और दोषियों पर कार्रवाई की जानी चाहिए। लेकिन बिना प्रमाण व्यापक आरोप लगाकर लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को कटघरे में खड़ा करना भी उचित नहीं है।
रामलीला मैदान की रैली और भाजपा के जवाबी अभियान से आगे सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि क्या यह संघर्ष वास्तव में मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए है, या संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास को सत्ता तक पहुंचने का राजनीतिक मार्ग बनाया जा रहा है? इसका उत्तर नारों से नहीं, बल्कि तथ्यों और कार्रवाई से मिलेगा। लोकतंत्र की मजबूती जनता के विश्वास में है। यह विश्वास तभी कायम रह सकता है, जब संस्थाएं जवाबदेह हों, राजनीतिक दल प्रमाणों के आधार पर बात करें और मतदाता का अधिकार सर्वोपरि रहे।

के. के. उपाध्याय
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)