राहुल गांधी की रामलीला मैदान रैली के जवाब में भाजपा ने उतारे मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री।
तेरह करोड़ मतदाताओं के नाम काट दिए गए! लोकतंत्र खतरे में है! वोट चोरी हो रही है! चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं है! पिछले कुछ समय से विपक्ष इन्हीं आरोपों के सहारे देश में राजनीतिक वातावरण बनाने की कोशिश कर रहा है। संसद से सड़क तक शोर मचाया गया। संवैधानिक संस्थाओं को कठघरे में खड़ा किया गया। आंदोलन का आह्वान हुआ। लेकिन एक सवाल लगातार अनुत्तरित रहा। यदि तेरह करोड़ मतदाताओं के अधिकार छीन लिए गए, तो उनके समर्थन में
व्यापक जनसैलाब सड़कों पर क्यों नहीं दिखाई दिया?
यह प्रश्न विपक्ष के आंदोलन की राजनीतिक ताकत पर है। किसी आरोप की सत्यता केवल आंदोलन में जुटी भीड़ से तय नहीं होती। लेकिन इतने बड़े मुद्दे पर अपेक्षित जनसमर्थन का अभाव राजनीतिक दृष्टि से मामूली बात भी नहीं है। SIR यानी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन अब एक नए मोड़ पर है। राहुल गांधी ने एक नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली का आह्वान किया है। उधर भाजपा ने भी देशव्यापी जवाबी अभियान की तैयारी कर ली है। इसी बीच सर्वोच्च न्यायालय में चुनाव आयोग के हलफनामे ने विपक्ष के एक महत्वपूर्ण आरोप को गंभीर चुनौती दे दी है।
तेरह करोड़ का आंकड़ा : सच कितना, सियासत कितनी?
विपक्ष ने SIR के दौरान लगभग तेरह करोड़ मतदाता प्रविष्टियों के मसौदा सूची से बाहर होने को राजनीतिक मुद्दा बनाया। यह संख्या निश्चित रूप से बड़ी है। इसकी निष्पक्ष जाँच और प्रत्येक पात्र मतदाता के अधिकार की रक्षा आवश्यक है। लेकिन यहाँ एक बुनियादी अंतर समझना होगा। मृत मतदाताओं के नाम हटाना, दोहरी प्रविष्टियाँ समाप्त करना, स्थायी रूप से स्थानांतरित मतदाताओं की जानकारी दुरुस्त करना और किसी वास्तविक मतदाता को गलत तरीके से सूची से बाहर कर देना एक जैसी स्थितियाँ नहीं हैं। मतदाता सूची का शुद्धिकरण चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी है। इसके साथ यह सुनिश्चित करना भी उसकी जिम्मेदारी है कि किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से न हटे। विपक्ष को यह स्पष्ट करना चाहिए कि चिह्नित प्रविष्टियों में कितने वास्तविक और पात्र मतदाता गलत तरीके से बाहर हुए। उनके मामले क्या हैं? शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई? तेरह करोड़ का आंकड़ा उछालना आसान है। तेरह करोड़ लोगों का मताधिकार वास्तव में छिन जाने का प्रमाण देना कहीं अधिक कठिन। लोकतंत्र आरोपों से नहीं, तथ्यों से चलता है।
सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा : एकतरफा फैसलों के आरोप को चुनौती
इस पूरे विवाद में 26 अक्टूबर का घटनाक्रम अत्यंत महत्वपूर्ण है। चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा दाखिल करके स्पष्ट किया है कि SIR से संबंधित तीनों प्रमुख आदेश सर्वसम्मति से पारित किए गए थे। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी इन निर्णयों में सहभागी थे। आयोग के अनुसार, 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 के SIR आदेश तीनों सदस्यों की सहमति से जारी हुए। यह स्पष्टीकरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पहले इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित रिपोर्टों के आधार पर आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए थे।
आरोप था कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपने दोनों सहयोगियों की आपत्तियों के बावजूद कई निर्णय लिए। अब चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय में अपना आधिकारिक पक्ष प्रस्तुत कर दिया है। आयोग ने स्पष्ट किया कि फाइलों पर दर्ज टिप्पणियाँ, सवाल और सुझाव अंतिम निर्णय नहीं होते। अंतिम निर्णय निर्धारित प्रक्रिया और आवश्यक स्वीकृति के बाद ही लागू होता है। यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य भी है। आयोग ने दोनों चुनाव आयुक्तों द्वारा आंतरिक कार्य-विभाजन के एक आदेश पर आपत्ति दर्ज कराने की बात स्वीकार की है। लेकिन आयोग के अनुसार, वह आदेश लागू ही नहीं हुआ। अर्थात् आंतरिक प्रशासनिक मतभेद और SIR के अंतिम आदेशों की सर्वसम्मति दो अलग विषय हैं। यही वह अंतर है, जिसे राजनीतिक आरोपों के शोर में समझना आवश्यक है।
अखबार की खबर से संविधान नहीं चलता
चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में एक महत्वपूर्ण कानूनी तर्क रखा है। आयोग के अनुसार, किसी समाचारपत्र की रिपोर्ट अपने आप में उसमें वर्णित तथ्यों का न्यायिक प्रमाणन नहीं होती। इसका अर्थ पत्रकारिता की भूमिका को कमतर आँकना नहीं है। समाचारपत्र सवाल उठाते हैं। दस्तावेज सामने लाते हैं। सत्ता और संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करते हैं। लेकिन समाचार और न्यायिक रूप से स्थापित तथ्य के बीच अंतर है। अखबार की रिपोर्ट सूचना देती है। प्रमाण उसकी सत्यता स्थापित करते हैं। संविधान और कानून की व्याख्या न्यायालय करता है। यही लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार है। चुनाव आयोग ने हलफनामे में यह भी स्पष्ट किया है कि मतदाता पंजीकरण के वैधानिक फॉर्म-6 में कोई संशोधन नहीं किया गया। SIR के अंतर्गत इस्तेमाल किया गया अतिरिक्त घोषणा-पत्र एक अलग दस्तावेज है। इस स्पष्टीकरण से विपक्ष के आरोपों पर नए प्रश्न खड़े हुए हैं। हालाँकि आयोग का हलफनामा न्यायालय का अंतिम निर्णय नहीं है। उसकी कानूनी और तथ्यात्मक परीक्षा सर्वोच्च न्यायालय में होनी है। लेकिन राजनीतिक दृष्टि से अब विपक्ष के सामने चुनौती बढ़ गई है। यदि तीनों चुनाव आयुक्त SIR के प्रमुख निर्णयों पर सहमत थे, तो मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा एकतरफा फैसले लेने का आरोप किन प्रमाणों पर आधारित है? राहुल गांधी और उनके सहयोगियों को इसका उत्तर देना होगा।
आंदोलन का उद्देश्य मतदाता अधिकार या संस्थाओं के प्रति अविश्वास?
लोकतंत्र में विपक्ष को विरोध करने का पूरा अधिकार है। चुनाव आयोग से सवाल पूछना भी उसका अधिकार है। लेकिन संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करना और उनकी विश्वसनीयता को बिना पर्याप्त प्रमाण खारिज कर देना अलग-अलग बातें हैं। विपक्ष के राजनीतिक अभियान को इसी कसौटी पर परखना चाहिए। क्या इस आंदोलन का प्राथमिक उद्देश्य मतदाता सूची की त्रुटियाँ दूर कराना है? या चुनाव आयोग के प्रति अविश्वास को एक बड़े राजनीतिक अभियान में बदलना? यदि वास्तविक मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटे हैं, तो उन्हें वापस जोड़ने के लिए अभियान चलना चाहिए। प्रत्येक प्रभावित मतदाता को न्याय मिलना चाहिए। लेकिन यदि मतदाता अधिकारों के नाम पर राजनीतिक वातावरण ऐसा बनाया जाए कि चुनाव की पूरी प्रक्रिया ही संदिग्ध दिखाई देने लगे, तो उसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। लोकतंत्र केवल चुनाव कराने से नहीं चलता। वह चुनाव प्रक्रिया के प्रति सार्वजनिक विश्वास पर भी टिका होता है। यह विश्वास अंधस्वीकृति से नहीं, पारदर्शिता और जवाबदेही से बनता है।
राहुल गांधी और सत्ता की वंशवादी विरासत
इस राजनीतिक संघर्ष का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू राहुल गांधी का नेतृत्व है। कांग्रेस का इतिहास स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा है। मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरू उस आंदोलन के महत्वपूर्ण नेता थे। लेकिन स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस में नेहरू-गांधी परिवार का राजनीतिक प्रभुत्व जिस प्रकार स्थापित हुआ, उसने पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र पर लगातार प्रश्न खड़े किए। जवाहरलाल नेहरू के बाद इंदिरा गांधी। फिर राजीव गांधी। उसके बाद सोनिया गांधी और राहुल गांधी। बीच में गैर-गांधी नेताओं ने भी कांग्रेस का नेतृत्व किया। लेकिन पार्टी की राजनीतिक धुरी बार-बार इसी परिवार के आसपास लौटती रही। यही कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी वैचारिक चुनौती है। जो दल देश में लोकतंत्र की रक्षा का दावा करता है, वह अपने भीतर नेतृत्व के लोकतांत्रिक अवसरों का विस्तार कितना कर पाया है? लोकतंत्र में सत्ता किसी परिवार का जन्मसिद्ध अधिकार नहीं है। जनता किसी को सत्ता देती है। जनता ही सत्ता से बाहर करती है। यहाँ कोई स्थायी सिंहासन नहीं होता। कोई स्थायी राजपरिवार नहीं होता। कोई जन्मजात युवराज नहीं होता। राजनीतिक विरासत चुनाव लड़ने का अवसर दे सकती है। लेकिन सत्ता का अधिकार केवल जनादेश देता है। राहुल गांधी के नेतृत्व की वास्तविक परीक्षा यही है कि वह जनता का विश्वास अर्जित करके सत्ता का विकल्प प्रस्तुत करें, न कि केवल वर्तमान व्यवस्था के प्रति अविश्वास को राजनीतिक आधार बनाएँ।
एक नवंबर : रामलीला मैदान में राहुल गांधी की परीक्षा
राहुल गांधी ने एक नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में बड़ी रैली का आह्वान किया है। उन्होंने किसानों, मजदूरों, युवाओं, महिलाओं, विद्यार्थियों और व्यापारियों से इसमें शामिल होने की अपील की है। कांग्रेस और उसके सहयोगी दल इसे मतदाता अधिकारों की रक्षा का अभियान बता रहे हैं। लेकिन इस रैली की सफलता केवल भीड़ की संख्या से नहीं मापी जाएगी। महत्वपूर्ण यह होगा कि विपक्ष कितने वास्तविक प्रभावित मतदाताओं के मामले सामने रखता है। कितने आरोप दस्तावेजों से पुष्ट करता है। और मतदाता सूची की त्रुटियों को दूर कराने के लिए क्या ठोस पहल करता है। राजनीतिक कार्यकर्ताओं को संगठित करके भीड़ जुटाना एक बात है। वास्तविक जनपीड़ा को जनांदोलन में बदलना दूसरी। रामलीला मैदान में राहुल गांधी भाषण तो दे सकते हैं, लेकिन तेरह करोड़ के आरोप का जवाब उन्हें तथ्यों से ही देना होगा।
भाजपा की जवाबी रणनीति : सड़क पर मुख्यमंत्री, मंत्री और संगठन
इस बार भाजपा ने विपक्ष के अभियान का जवाब केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस और राजनीतिक बयानों से देने के बजाय सड़क पर उतरने की रणनीति बनाई है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, भाजपा ने देशव्यापी पदयात्राओं की रूपरेखा तैयार की है। इसका उद्देश्य SIR को लेकर विपक्ष के आरोपों का प्रतिवाद करना और मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया के बारे में जनता को जानकारी देना है। इस अभियान में केंद्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और संगठन के वरिष्ठ नेताओं को जिम्मेदारी दी जा रही है। एक नवंबर को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लखनऊ में पदयात्रा प्रस्तावित है। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के शिमला में कार्यक्रम की जानकारी सामने आई है। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सहित अनेक वरिष्ठ नेताओं के अभियान में शामिल होने की योजना है। भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने इस अभियान के समन्वय की जिम्मेदारी भी वरिष्ठ पदाधिकारियों को सौंपी है। जिला मुख्यालयों तक पदयात्राएँ आयोजित करने और बड़े स्तर पर जनभागीदारी सुनिश्चित करने की तैयारी है। इस अभियान को ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ का नाम दिया गया है। राजनीतिक दृष्टि से यह महत्वपूर्ण बदलाव है। विपक्ष चुनाव आयोग के विरुद्ध आरोपों को लेकर सड़क पर उतर रहा है। भाजपा उन्हीं आरोपों का जवाब देने के लिए सड़क पर उतरने की तैयारी कर रही है। अब मुकाबला केवल राजनीतिक बयानों का नहीं रहेगा। यह संगठन, जनसंपर्क, तथ्यों और जनविश्वास का मुकाबला भी होगा।
संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा किसी दल की बपौती नहीं
भारत में चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता का महत्व किसी राजनीतिक दल की जीत या हार से कहीं अधिक है। चुनाव आयोग भाजपा का नहीं है। कांग्रेस का नहीं है। किसी सरकार का नहीं है। वह भारत के संविधान के अंतर्गत स्थापित स्वतंत्र संस्था है। उसके निर्णयों पर सवाल उठाए जा सकते हैं। उसके विरुद्ध न्यायालय जाया जा सकता है। उसकी प्रक्रियाओं की आलोचना की जा सकती है। लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि आरोप प्रमाणों पर आधारित हों। इसी तरह चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि वह प्रत्येक गंभीर शिकायत का जवाब दे। प्रत्येक पात्र मतदाता के अधिकार की रक्षा करे। अपनी निर्णय प्रक्रिया को पारदर्शी रखे। संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा उनकी जवाबदेही से मजबूत होती है, राजनीतिक संरक्षण से नहीं। भाजपा के लिए भी यही कसौटी है। उसे आयोग की ओर से निर्णय नहीं सुनाना चाहिए। उसे विपक्ष के राजनीतिक आरोपों का जवाब तथ्यों से देना चाहिए। न्यायिक विवाद का अंतिम फैसला न्यायालय को ही करने देना चाहिए।
लोकतंत्र में अविश्वास की राजनीति कितनी दूर जाएगी?
भारत ने अनेक राजनीतिक उतार-चढ़ाव देखे हैं। कांग्रेस की सरकारें बनी हैं। कांग्रेस की सरकारें गई हैं। भाजपा विपक्ष में रही है। भाजपा सत्ता में आई है। क्षेत्रीय दलों ने भी जनता का विश्वास प्राप्त करके सरकारें बनाई हैं। यही लोकतंत्र की विशेषता है। लेकिन यदि राजनीतिक पराजय के बाद हर बार चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर व्यापक आरोप लगाए जाएँ, तो उससे जनविश्वास प्रभावित हो सकता है। इसका अर्थ चुनावी अनियमितताओं को नजरअंदाज करना नहीं है। इसके विपरीत, प्रत्येक वास्तविक अनियमितता की जाँच होनी चाहिए। दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए। पात्र मतदाताओं के अधिकार सुरक्षित रहने चाहिए। लेकिन आरोपों को प्रमाणित करने की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है। विपक्ष आवश्यक है। आंदोलन भी आवश्यक हैं। लेकिन आंदोलन की नैतिक शक्ति उसके आरोपों की गंभीरता, प्रमाणों की विश्वसनीयता और जनता के विश्वास से बनती है।
निष्कर्ष : तेरह करोड़ का शोर और एक नवंबर का सवाल
SIR के विरोध में विपक्ष ने बड़ा राजनीतिक अभियान खड़ा करने की कोशिश की। तेरह करोड़ मतदाता प्रविष्टियों का मुद्दा उठाया गया। चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए। मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध आरोप लगाए गए। अब सर्वोच्च न्यायालय में चुनाव आयोग ने हलफनामा देकर स्पष्ट किया है कि SIR के तीनों प्रमुख आदेश सर्वसम्मति से पारित हुए थे। इससे एकतरफा निर्णय लेने के आरोप को महत्वपूर्ण चुनौती मिली है। उधर राहुल गांधी एक नवंबर को रामलीला मैदान में अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने की तैयारी कर रहे हैं। भाजपा भी देशभर में अपने मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों और संगठन के साथ जवाबी अभियान चलाने जा रही है। अब जनता के सामने दो राजनीतिक अभियान होंगे। एक तरफ विपक्ष का चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने वाला आंदोलन। दूसरी तरफ भाजपा का उन आरोपों का प्रतिवाद करने वाला अभियान। लेकिन इस पूरे राजनीतिक संघर्ष में सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति वह सामान्य मतदाता है, जिसके नाम पर यह लड़ाई लड़ी जा रही है। उसका नाम मतदाता सूची में सुरक्षित रहना चाहिए। उसका मतदान का अधिकार सुरक्षित रहना चाहिए। उसकी शिकायत का समाधान होना चाहिए। और किसी भी राजनीतिक दल को उसके अधिकारों के नाम पर तथ्यहीन दावे करने की छूट नहीं मिलनी चाहिए। राहुल गांधी के सामने अब चुनौती केवल भीड़ जुटाने की नहीं है। चुनौती अपने आरोपों को प्रमाणित करने की है। तेरह करोड़ का शोर बहुत बड़ा है। लेकिन उससे भी बड़ा सवाल है क्या विपक्ष मतदाता अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा है, या संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास को सत्ता तक पहुँचने का राजनीतिक रास्ता बनाना चाहता है? इसका उत्तर एक नवंबर के नारों में नहीं, तथ्यों में मिलेगा। क्योंकि लोकतंत्र में सत्ता का रास्ता जनता के विश्वास से निकलता है, संस्थाओं के प्रति अविश्वास से नहीं।

लेखक- के. के. उपाध्याय, वरिष्ठ पत्रकार हैं।