खाद्य पदार्थों में मिलावट अब केवल बाजार में होने वाली धोखाधड़ी नहीं, बल्कि आम आदमी की सेहत, आर्थिक सुरक्षा और व्यवस्था की जवाबदेही से जुड़ा गंभीर सवाल बन चुकी है। जिस भोजन को मनुष्य जीवन का आधार मानता है, वही उसकी सेहत के लिए खतरा बनने लगे तो चिंता स्वाभाविक है। विडंबना है कि विज्ञान, तकनीक और खाद्य प्रसंस्करण में तेजी से प्रगति के बावजूद खाने-पीने की वस्तुओं की शुद्धता को लेकर आशंकाएं बढ़ रही हैं। नामी कंपनियों के उत्पादों की गुणवत्ता पर सवाल उठने से उपभोक्ताओं का भरोसा कमजोर होता है। हाल ही में मीडिया में प्रकाशित एक खबर में भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण की कार्रवाई के संदर्भ में कुछ बड़े ब्रांडों के उत्पादों में कथित अनियमितताओं का उल्लेख हुआ।
बाजार में किसी उत्पाद की पहचान गुणवत्ता के साथ-साथ ब्रांड, पैकेजिंग और विज्ञापन से भी बनती है। कंपनियों के बड़े-बड़े दावे उपभोक्ता को विश्वास दिलाते हैं कि महंगा और प्रतिष्ठित ब्रांड सुरक्षित विकल्प है। इसी भरोसे लोग सीमित बजट में भी नामी उत्पाद खरीदते हैं।
गुणवत्ता पर सवाल उठने से उपभोक्ता असमंजस में पड़ता है। हालांकि, किसी नमूने का मानकों पर खरा न उतरना और कंपनी पर मिलावट का आरोप लगना अलग-अलग स्थितियां हैं। जांच के निष्कर्ष, कंपनी का पक्ष और नियामक संस्था की अंतिम कार्रवाई पारदर्शी ढंग से सामने आनी चाहिए।
प्रतिस्पर्धा का आधार गुणवत्ता और उपभोक्ता का विश्वास होना चाहिए, केवल प्रचार और मुनाफा नहीं। दावे वास्तविक गुणवत्ता से मेल न खाएं, तो यह उपभोक्ता के अधिकारों के साथ खिलवाड़ है।
मिलावटखोरी का सबसे गंभीर पहलू यह है कि इसका नुकसान तत्काल दिखाई नहीं देता। दूषित खाद्य पदार्थ के सेवन से हर व्यक्ति तुरंत बीमार पड़े, यह जरूरी नहीं है; स्वास्थ्य संबंधी जोखिम कई बार लंबे समय बाद सामने आते हैं। इसलिए खाद्य पदार्थों की शुद्धता सामान्य खरीदारी से आगे बढ़कर सार्वजनिक स्वास्थ्य का विषय है।
दूध, घी, तेल, मसाले, मिठाइयां, बिस्कुट और पैकेटबंद खाद्य पदार्थ दैनिक जीवन का हिस्सा हैं। इनमें हानिकारक मिलावट व्यापक आबादी को प्रभावित कर सकती है और बच्चों, गर्भवती महिलाओं तथा बीमार लोगों के लिए अधिक जोखिम पैदा कर सकती है।
इसका आर्थिक पक्ष भी गंभीर है। सामान्य परिवार भोजन, शिक्षा, आवास और स्वास्थ्य पर बड़ी राशि खर्च करता है। असुरक्षित खाद्य पदार्थों के सेवन से बीमारी होने पर इलाज और दवाइयों का अतिरिक्त खर्च आर्थिक संकट का कारण बन सकता है।
आम आदमी खरीदते समय खाद्य पदार्थ की शुद्धता की पूरी जांच नहीं कर सकता। पैकेट की जानकारी पढ़ना उपयोगी है, लेकिन हर मिलावट का पता उपभोक्ता नहीं लगा सकता। इसलिए खाद्य सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी नागरिकों पर डालना अनुचित है; मजबूत नियामक व्यवस्था जरूरी है।
खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 और उसके अंतर्गत बने नियमों का ढांचा मौजूद है। एफएसएसएआई राष्ट्रीय स्तर पर खाद्य सुरक्षा के मानक निर्धारित करता है, जबकि राज्य स्तरीय एजेंसियां निरीक्षण, नमूने लेने और कानून के अनुसार कार्रवाई करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसके बावजूद सवाल है कि मिलावट और गुणवत्ता संबंधी अनियमितताओं को रोकने के लिए निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है। इसके लिए केंद्र और राज्य की एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय, निरीक्षण का सार्वजनिक विवरण और शिकायतों के निस्तारण की समयसीमा तय होनी चाहिए। समय पर विश्वसनीय सूचना मिलने से उपभोक्ता अफवाहों से बचेंगे, सही निर्णय ले सकेंगे और ईमानदार कंपनियों की प्रतिष्ठा भी सुरक्षित रहेगी।
केवल छापेमारी और नोटिस से समाधान नहीं होगा। जोखिम आधारित निरीक्षण, अधिक खपत वाले उत्पादों की जांच, प्रयोगशालाओं की क्षमता में वृद्धि, समय पर रिपोर्ट और दोषियों पर कानूनी कार्रवाई जरूरी है।नमूना मानकों पर खरा न उतरे, तो उपभोक्ता को यह जानने का अधिकार है कि कंपनी ने सुधार किया, उत्पाद वापस लिया, दंड भुगता या दोबारा जांच कराई गई। ऐसी जानकारी से पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी।
सरकार और संबंधित एजेंसियों को सुनिश्चित करना चाहिए कि नियम सभी पर समान रूप से लागू हों। किसी कंपनी का आकार, बाजार में हिस्सेदारी या विज्ञापनों में लोकप्रियता कानून के अनुपालन में छूट का आधार नहीं बन सकती। दूसरी ओर, केवल आरोप के आधार पर किसी ब्रांड को दोषी घोषित करना भी उचित नहीं है। निष्पक्ष जांच और प्रमाण-आधारित कार्रवाई ही व्यवस्था में विश्वास बनाए रख सकती है।
खाद्य कारोबार सीधे जीवन से जुड़ा है, इसलिए कंपनियों की जिम्मेदारी अधिक है। उपभोक्ता उत्पाद के साथ भरोसा भी खरीदता है। कच्चे माल की जांच, उत्पादन प्रक्रिया की निगरानी, स्वच्छता और तैयार उत्पादों की नियमित जांच जरूरी है। कंपनियां गुणवत्ता नियंत्रण को औपचारिकता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी मानें। गंभीर खामी सामने आने पर सुधार करना और जरूरत पड़ने पर उत्पाद वापस लेना भी जरूरी है।
मिलावटखोरी के खिलाफ जागरूक उपभोक्ता भी भूमिका निभा सकता है। खरीदारी के समय निर्माण और समाप्ति तिथि, पैकेजिंग, सामग्री तथा लाइसेंस की जानकारी देखें। संदेह होने पर खाद्य सुरक्षा विभाग या उपभोक्ता शिकायत व्यवस्था से संपर्क करें और बिल सुरक्षित रखें।जागरूकता का अर्थ जिम्मेदारी आम आदमी पर डालना नहीं है। शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई होनी चाहिए और दोषियों को दंड मिलना चाहिए।मीडिया को सनसनी फैलाने के बजाय जांच के निष्कर्षों, सरकारी कार्रवाई और उपभोक्ता अधिकारों से जुड़े तथ्य सामने लाने चाहिए।
सवाल है कि मिलावटखोरी के खिलाफ आक्रोश व्यापक जनचेतना में कब बदलेगा? बड़ी खबरों पर कुछ दिन चर्चा होती है, फिर मामला भुला दिया जाता है। खाद्य सुरक्षा पर निरंतर निगरानी और सार्वजनिक दबाव जरूरी है। नागरिक सवाल पूछें, जनप्रतिनिधियों को जवाबदेह बनाएं और कार्रवाई की जानकारी मांगें।
लोकतंत्र में जनता की आवाज तभी प्रभावी बनती है, जब वह तथ्यों और अधिकारों के आधार पर निरंतर उठाई जाए। खाद्य सुरक्षा के मामले में भी यही रास्ता अपनाना होगा। किसी कंपनी के खिलाफ अपुष्ट आरोप फैलाने के बजाय प्रमाणित शिकायत करना और जांच के परिणामों पर नजर रखना अधिक प्रभावी तरीका है।
अंततः किसी देश की प्रगति का मूल्यांकन केवल आर्थिक वृद्धि, बड़े उद्योगों या बाजार में उपलब्ध ब्रांडों की संख्या से नहीं किया जा सकता। असली कसौटी यह भी है कि नागरिकों को सुरक्षित भोजन, स्वच्छ पानी और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं कितनी सुलभ हैं। यदि आम आदमी अपनी थाली के भोजन की शुद्धता को लेकर आशंकित है, तो यह व्यवस्था के लिए आत्ममंथन का विषय है।
ब्रांड की प्रतिष्ठा विज्ञापन से बन सकती है, लेकिन भरोसा गुणवत्ता और ईमानदारी से ही कायम रहता है। मिलावटखोरी पर अंकुश लगाने के लिए सरकार की सख्ती, कंपनियों की जवाबदेही, जांच व्यवस्था की पारदर्शिता और जनता की जागरूकता एक साथ जरूरी हैं। आखिर मुनाफे से अधिक मूल्यवान मनुष्य का जीवन है। भोजन जीवन देने का माध्यम होना चाहिए, बीमारी और आर्थिक संकट का कारण नहीं। अब समय आ गया है कि खाद्य सुरक्षा को केवल सरकारी फाइलों और कभी-कभार की कार्रवाई का विषय न मानकर राष्ट्रीय जनस्वास्थ्य की प्राथमिकता बनाया जाए।

विडंबना
एड. जयदेव राठी
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)