अक्टूबर 2001 में नरेंद्र मोदी ने जब गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, तब शायद ही किसी ने सोचा था कि वे एक साल का भी कार्यकाल पूरा कर पाएंगे। राजनीतिक जानकारों और गुजरात के लोगों की इस सोच के पीछे वजह भी थीं। मोदी के गुजरात का सरदार बनने से पहले के पाँच वर्षों में राज्य को चार मुख्यमंत्रियों को देखना पड़ा था। मोदी राज्य के किसी ताकतवर जाति समुदाय से भी नहीं थे और सबसे बड़ी बात यह थी कि मुख्यमंत्री बनने से पहले उन्होंने कोई चुनाव भी नहीं लड़ा था। हाँ, पर्दे के पीछे की राजनीति के मंजे हुए खिलाड़ी के तौर पर वे स्थापित हो चुके थे। इतना ही नहीं, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर राज्यों के बीजेपी प्रभारी के रूप में भी वे अपनी सियासी समझ का लोहा मनवा चुके थे। लेकिन मोदी ने सभी आशंकाओं को न सिर्फ खारिज कर दिया, बल्कि चौथाई सदी तक लगातार सत्ता के केंद्रबिंदु बने रहने वाली शख्सियत बन चुके हैं। इसके पहले मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता ज्योति बसु के नाम देश में सबसे लंबे समय, यानी करीब 23 साल तक सत्ता संभालने का रिकॉर्ड था। मोदी वह रिकॉर्ड तोड़कर काफी आगे बढ़ चुके हैं।
हाल के दिनों में एक वरिष्ठ हिंदी पत्रकार ने ‘मोदी मार्ग’ की अवधारणा देकर आलोचनाओं को आमंत्रित किया है। बेशक, मोदी मार्ग की इन दिनों आलोचना हो रही है, लेकिन आने वाले दिनों में जब नरेंद्र मोदी का इतिहास लिखा जाएगा, तो निश्चित तौर पर मोदी मार्ग या मोदीत्व की अवधारणा को भी स्वीकार किया जाएगा। किसी शख्सियत के जरिए शुरू किए गए पंथ या वैचारिक धारा को उसके जीवनकाल में सर्वमान्यता और सर्वस्वीकार्यता कम ही मिलती है। लेकिन जब वही शख्सियत इतिहास की धारा में विलीन हो जाती है, तो उसके दिखाए रास्तों को पंथ का दर्जा मिल जाता है। गांधी बेशक अपनी जिंदगी में ही महात्मा के रूप में स्थापित हो चुके थे, लेकिन उनके कई प्रयोगों की उसी तरह आलोचना हो रही थी, जैसे आज मोदी के कई कदमों की उनके वैचारिक विरोधी कटु आलोचना करते हैं। वैसे भी, भारतीय समाज पदधारियों का शुरू में स्वागत करता है और बाद में उनका विरोध करने लगता है। लेकिन वही शख्सियत जब इतिहास में समाहित हो जाती है, तो कुछ अपवादों को छोड़कर समाज उसका प्रशंसक हो जाता है।
बीजेपी की ही राजनीति का उदाहरण ले सकते हैं। एक दौर में बीजेपी विरोधियों की नजर में अटल उदार थे और आडवाणी कट्टर। लिहाजा, आडवाणी आलोचनाओं के केंद्र में थे। लेकिन जैसे ही अटल युग की समाप्ति हुई, आडवाणी उन्हीं विरोधियों की नजर में आदर के पात्र बनते गए और मोदी के कटु आलोचकों की संख्या बढ़ती गई। कुछ इसी अंदाज में भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में आने वाले दिनों में कोई अन्य नेता उभरा, तो हो सकता है कि मोदी बीजेपी विरोधियों की नजर में ही प्रशंसा के पात्र बन जाएँ और बीजेपी का दूसरा नेता आडवाणी और मोदी की तरह आलोचनाओं के केंद्र में आ जाए।
मोदी की सबसे बड़ी चुनौती खुद की स्वीकार्यता बढ़ाना रही है। इसमें वे कामयाब रहे हैं। इतना ही नहीं, वे सबसे ज्यादा समय तक सत्ता को अपने इर्द-गिर्द केंद्रीकृत करने में भी सफल रहे हैं। आज भारत की केंद्रीय सत्ता ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी का संगठन भी उन्हीं के इर्द-गिर्द केंद्रित है।यह मोदी का दुर्भाग्य रहा कि उनके सत्ता संभालने के महज छह महीने बाद ही राज्य को गोधरा कांड की वजह से भयानक सांप्रदायिक दंगों का सामना करना पड़ा। गुजरात सरकार की रिपोर्ट के अनुसार, इन दंगों में 1,044 लोग मारे गए, जबकि 2,548 लोग घायल हुए थे। इसके अलावा, 223 लोग लापता बताए गए। दंगों के सात साल बीतने के बाद सरकार के ही अनुसार, लापता लोगों की संख्या कुछ बढ़ गई।
इन दंगों के बाद नरेंद्र मोदी विशेषकर कांग्रेस और वामपंथी दलों के निशाने पर आ गए। देश के वामपंथी सोच से प्रभावित स्वयंसेवी संगठनों ने उनके खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर मोर्चा खोल दिया। एक तरह से मोदी को राजनीतिक घृणा का पात्र बनाने की कोशिश की गई। उनके चरित्र-हनन तक की कोशिशें हुईं। गुजरात दंगों के साथ ही इशरत जहाँ मुठभेड़ कांड को लेकर उनके खिलाफ सीबीआई जाँच हुई। सीबीआई के समक्ष बतौर मुख्यमंत्री पूछताछ के लिए उन्हें कई बार घंटों तक उपस्थित रहना पड़ा और पूछताछ का सामना करना पड़ा। गुजरात दंगों के दाग के चलते एक दौर में अमेरिका ने उन्हें वीजा देने से इनकार कर दिया।
लेकिन मोदी गजब जीवट के धनी हैं। तीखे और अपमानजनक विरोध के साथ ही चरित्र-हनन की सीमा तक मोदी को बदनाम करने की कोशिशें हुईं, लेकिन मोदी रुके नहीं। कभी पर्दे के पीछे से राजनीति करने वाले मोदी लगातार आगे बढ़ते रहे। गुजरात में जब चीजें पटरी पर आनी शुरू हुईं, तो उन्होंने राज्य के विकास को लेकर अपना मॉडल पेश किया, जिसे कालांतर में देश ने ‘गुजरात मॉडल’ के नाम से जाना। ‘गुजरात मॉडल’ के तहत विकास और विकास की गति को बनाए रखने के लिए प्रवासियों और निवेशकों को लुभाने के उद्देश्य से उन्होंने ‘वाइब्रेंट गुजरात’ नाम से आयोजन शुरू किए, जिन्हें देखते ही देखते राज्य की जनता ने अपना लिया।
जिस राज्य में महज पाँच साल में चार मुख्यमंत्री आए और गए, उसी राज्य में मोदी ने साढ़े बारह साल से अधिक समय तक सत्ता संभालने का रिकॉर्ड बनाया। 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान उनकी ख्याति राज्य की सीमाओं से बाहर तक पहुँच चुकी थी या पहुँच रही थी। इसका ही नतीजा रहा कि 2012 के गुजरात विधानसभा चुनावों के वक्त राष्ट्रीय मीडिया के एक हिस्से ने मोदी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार कर लिया। तब कहा जा रहा था कि गुजरात इस बार सिर्फ अपने मुख्यमंत्री का ही नहीं, बल्कि देश के भावी प्रधानमंत्री का चुनाव कर रहा है।मोदी ने अपने लंबे शासनकाल में ढेरों उपलब्धियाँ हासिल की हैं, लेकिन मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि उनके शासनकाल में भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि में सुधार हुआ है। मोदी ने आर्थिक मोर्चे पर देश को काफी गति दी है। मोदी कहते हैं कि उनकी नजर में सिर्फ चार जातियाँ हैं महिला, युवा, गरीब और किसान। मोदी के लंबे शासनकाल में इन चारों ही वर्गों का ध्यान रखने की कोशिशें बढ़ी हैं। भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति बन चुका है।
कृषि में साढ़े चार प्रतिशत सालाना की विकास दर हासिल की जा चुकी है। बीजेपी के एजेंडे के तहत अयोध्या में राममंदिर बन चुका है। कश्मीर को अलग-थलग करने वाले संविधान के विशेष अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाया जा चुका है। मोदी के शासनकाल की उपलब्धियाँ गिनाने बैठें, तो पूरी रात गुजर जाएगी। बस, मोटे तौर पर कह सकते हैं कि मोदी राज में देश ने अपना खोया गौरव हासिल करने की दिशा में एक मजबूत कदम जरूर बढ़ाया है।

उमेश चतुर्वेदी
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक हैं।)