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रांची/डेस्क: झारखंड हाई कोर्ट में दारोगाओं की वरीयता सूची से जुड़े मामले में सोमवार को सुनवाई हुई. मामले में दोनों पक्षों की ओर से बहस की गई. न्यायाधीश दीपक रोशन की एकल पीठ में लगभग 3 घंटे तक सभी पक्षों की ओर से अपने-अपने तर्क और आधार दिए गए. अब इस मामले में में पक्षकारों की ओर से अपनी-अपनी लिखित दलीलें और प्रमुख बिंदु दाखिल किए जाने हैं. मामले में मंगलवार को दोपहर 3 बजे से फिर विस्तृत सुनवाई होगी.
क्या है पूरा मामला
सीधी भर्ती से नियुक्त दारोगाओं को सीमित विभागीय प्रतियोगिता परीक्षा के जरिए सिपाही से दारोगा बने कर्मियों से नीचे रखे जाने को चुनौती दी गई है. याचिकाकर्ता उत्तम तिवारी की नियुक्ति वर्ष 2018 में सीधी भर्ती के माध्यम से सब इंस्पेक्टर के पद पर हुई थी.
विवाद वर्ष 2017 में दारोगा नियुक्ति के लिए जारी दो अलग-अलग विज्ञापनों से जुड़ा है. विज्ञापन संख्या 05/2017 के तहत सीधी भर्ती और विज्ञापन संख्या 09/2017 के तहत सीमित विभागीय प्रतियोगिता परीक्षा के माध्यम से नियुक्तियां हुई थीं. पुलिस विभाग की ओर से जारी वरीयता सूची में विभागीय प्रतियोगिता परीक्षा के जरिए दारोगा बने कर्मियों को सीधी भर्ती से आए दारोगाओं से ऊपर रखा गया है. इसी को लेकर याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट का रुख किया है.
सुनवाई के दौरान किसने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से प्रशिक्षण को वरीयता तय करने में महत्वपूर्ण बताते हुए दलील दी गई कि प्रशिक्षण नियुक्ति प्रक्रिया का अहम हिस्सा है. प्रशिक्षण पूरा नहीं करने पर संबंधित कर्मी से प्रशिक्षण पर खर्च राशि वापस लेने का भी प्रावधान है. इसलिए प्रशिक्षण पूरा होने की तारीख और इससे जुड़े अन्य पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
उत्तम तिवारी, अभिजीत कुमार समेत 10 अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता मनोज टंडन की ओर से दारोगाओं की अलग-अलग श्रेणियों का उल्लेख किया गया. बताया गया कि पुलिस विभाग में दारोगा सीधी भर्ती, पदोन्नति और सीमित विभागीय प्रतियोगिता परीक्षा के जरिए आते हैं. दलील दी गई कि पदोन्नति के जरिए आने वाले कर्मियों का प्रशिक्षण अलग अवधि का है, जबकि सीमित विभागीय प्रतियोगिता परीक्षा से आए कर्मियों का प्रशिक्षण सीधी भर्ती से आए दारोगाओं के प्रशिक्षण के लगभग बराबर है. ऐसे में प्रशिक्षण पूरा होने और प्रशिक्षण में मिले अंकों को भी वरीयता तय करने में महत्व दिया जाना चाहिए.
संजीव कुमार सिंह, ओम प्रकाश रे समेत 40 अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से वरीय अधिवक्ता अजीत कुमार की ओर से भी स्थायी नियुक्ति और प्रशिक्षण अवधि को लेकर दलील रखी गई. उनकी ओर से सवाल उठाया गया कि प्रशिक्षण अवधि में रहने वाले कर्मचारी को वरीयता के लिए किस आधार पर देखा जाएगा और क्या केवल सेवा में स्थायी होने की तारीख को वरीयता का आधार बनाया जा सकता है.
प्रवीण कुमार गुप्ता, मनीष कुमार समेत 10 प्रार्थना की ओर से अधिवक्ता सुमित गाड़ोदिया की ओर से भी इसी बिंदु को विस्तार से रखा गया. उनका जोर दारोगाओं की तीनों श्रेणियों के बीच अंतर और प्रशिक्षण की भूमिका पर रहा. दलील दी गई कि अलग-अलग माध्यम से नियुक्त कर्मियों की वरीयता तय करते समय केवल नियुक्ति की तारीख को ही एकमात्र आधार नहीं माना जा सकता.
वहीं, प्रतिवादी की ओर से अधिवक्ता इंद्रजीत सिन्हा की ओर से कहा गया कि यदि सेवा में स्थायी होने की तारीख को वरीयता का आधार माना जाना है तो इसके समर्थन में स्पष्ट नियम होना चाहिए. उनका तर्क था कि नियम के अभाव में सेवा में स्थायी होने की तारीख के आधार पर वरीयता तय नहीं की जा सकती. ऐसी स्थिति में शुरुआती नियुक्ति की तारीख को ही आधार माना जाना चाहिए.
राज्य सरकार ने क्या कहा?
इस मामले में राज्य सरकार की ओर से पक्ष रख रहीं अधिवक्ता ओइशी दास ने इन दलीलों का विरोध किया. उन्होंने कहा कि ऐसा कोई नियम नहीं है, जिसके तहत प्रशिक्षण पूरा होने या सेवा में स्थायी होने की तारीख को वरीयता तय करने का आधार बनाया जाए. राज्य के अनुसार शुरुआती नियुक्ति की तारीख ही वरीयता तय करने का आधार होनी चाहिए.
उन्होंने यह भी दलील दी कि कुछ अन्य पक्षकारों की नियुक्ति मार्च में हुई है, जबकि याचिकाकर्ता की नियुक्ति अगस्त में हुई. ऐसे में जो कर्मी पहले से सेवा में थे, उन्हें केवल बाद में हुई प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर वरीयता सूची में पीछे नहीं किया जा सकता.
बता दें कि इसी वरीयता विवाद के कारण हाई कोर्ट ने मई 2026 में दारोगाओं से इंस्पेक्टर पद पर होने वाली पदोन्नति प्रक्रिया पर रोक लगाई थी. बाद में राज्य सरकार ने रोक हटाने का आग्रह किया था, लेकिन कोर्ट ने फिलहाल रोक हटाने से इनकार कर दिया है.