मानसून के साथ हरियाली की विरासत

मानसून, जनभागीदारी और 'हरियाली की विरासत'

मानसून की पहली बारिश के साथ ही 'हरियाली की विरासत' को बढ़ाने का संकल्प, पौधारोपण के माध्यम से प्रकृति के संरक्षण और स्थायी विकास की ओर कदम।

By : स्वदेश डेस्क
मानसून, जनभागीदारी और 'हरियाली की विरासत'

प्रवीण कक्कड़

मानसून की पहली बारिश जब सूखी धरती को भिगोती है, तो वह केवल मौसम का बदलाव नहीं होता, बल्कि प्रकृति का एक संदेश भी होता है। यह संदेश हमें याद दिलाता है कि धरती, जल, वायु और हरियाली केवल संसाधन नहीं, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों की धरोहर हैं। पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारों, नीतियों या अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का विषय नहीं है। इसकी वास्तविक शुरुआत तब होती है, जब प्रत्येक नागरिक स्वयं को प्रकृति का संरक्षक मानते हुए अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करता है।

आज पर्यावरण को लेकर सबसे बड़ी चुनौती संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी की कमी है। हम स्वच्छ हवा चाहते हैं, पर्याप्त वर्षा चाहते हैं, हरियाली चाहते हैं, लेकिन यह भी चाहते हैं कि इसकी जिम्मेदारी कोई और निभाए। सच तो यह है कि जब तक हर व्यक्ति अपने हिस्से का योगदान नहीं देगा, तब तक कोई भी अभियान स्थायी सफलता हासिल नहीं कर सकता।

मानसून का यह समय केवल पौधारोपण का मौसम नहीं, बल्कि संकल्प का मौसम है। यदि प्रत्येक परिवार हर वर्ष कुछ पौधे लगाए और उनके संरक्षण का दायित्व भी निभाए, तो पर्यावरण संरक्षण जनआंदोलन बन सकता है।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पौधा लगाना ही पर्याप्त नहीं है। उसकी देखभाल, सुरक्षा और उसे वृक्ष बनने तक संरक्षित रखना कहीं अधिक जरूरी है। अक्सर हम फोटो खिंचवाकर पौधे लगा देते हैं, लेकिन कुछ महीनों बाद वे सूख जाते हैं। पर्यावरण संरक्षण की असली सफलता पौधारोपण की संख्या में नहीं, बल्कि पौधों के जीवित रहने की दर में छिपी है।

वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि एक विकसित वृक्ष कई लोगों के लिए आवश्यक ऑक्सीजन उपलब्ध कराने में सक्षम होता है। इसलिए वृक्षारोपण केवल पर्यावरणीय गतिविधि नहीं, बल्कि जीवन के प्रति हमारी नैतिक जिम्मेदारी भी है। किसी भी शहर या देश की प्रगति केवल ऊंची इमारतों और चौड़ी सड़कों से नहीं, बल्कि उसकी हरियाली, स्वच्छ हवा और प्राकृतिक संतुलन से भी मापी जानी चाहिए।

विरासत की अवधारणा

इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए हमें एक नई अवधारणा पर भी विचार करना चाहिए 'हरियाली की विरासत'। हम अपने पूर्वजों की स्मृति में पौधे लगाते हैं, यह हमारी सुंदर परंपरा है, लेकिन क्यों न हम अपने जीवनकाल में ही अपने नाम से कम-से-कम पाँच पौधे लगाएं, उन्हें संरक्षित करें और उन्हें वृक्ष बनते हुए देखें। इससे बेहतर विरासत शायद ही कोई हो सकती है। जमीन-जायदाद से बड़ी संपत्ति वह छांव होगी, जो आने वाली पीढ़ियों को मिलेगी।

पर्यावरण संरक्षण की शुरुआत घर के सामने खाली स्थान, कॉलोनी के पार्क, स्कूल परिसर, मंदिरों के आसपास की भूमि या किसी भी उपलब्ध सार्वजनिक स्थान से हो। आवासीय सोसाइटियों और मोहल्ला समितियों को मानसून के दौरान 'ग्रीन ऑडिट' कर यह तय करना चाहिए कि कितने पौधे लगाए जा सकते हैं और उनकी देखभाल की व्यवस्था कैसे होगी।

अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट

देश के संदर्भ में देखें, तो मध्य प्रदेश पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान रखता है। भारतीय वन सर्वेक्षण (ISFR) की रिपोर्ट के अनुसार लगभग 77 हजार वर्ग किलोमीटर से अधिक वन क्षेत्र के साथ मध्य प्रदेश देश में वन क्षेत्रफल के मामले में अग्रणी राज्यों में शामिल है। हालांकि, दूसरी ओर शहरीकरण, बढ़ते कंक्रीटीकरण और आधारभूत संरचनाओं के विस्तार ने नई चुनौतियां भी पैदा की हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, शहरों में 'अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट' तेजी से बढ़ रहा है, जिसके कारण तापमान लगातार बढ़ रहा है। इसका समाधान केवल बड़े जंगलों में नहीं, बल्कि शहरों के भीतर हरित क्षेत्रों को विकसित करने में है।

दुनिया के कई देशों ने इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य किए हैं। जापानी वैज्ञानिक अकीरा मियावाकी द्वारा विकसित मियावाकी पद्धति कम भूमि पर घने जंगल विकसित करने का प्रभावी मॉडल बन चुकी है। वहीं, सिंगापुर, मिलान और अन्य वैश्विक शहर वर्टिकल गार्डन तथा ग्रीन बिल्डिंग की अवधारणा को अपनाकर शहरी हरियाली बढ़ा रहे हैं। भारत के शहरों को भी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार ऐसे नवाचारों को अपनाना होगा।

पौधारोपण में स्वदेशी को प्राथमिकता

पौधारोपण में स्वदेशी प्रजातियों को प्राथमिकता देना आवश्यक है। नीम, पीपल, बरगद, करंज, अर्जुन, पलाश और अन्य स्थानीय वृक्ष न केवल कम संसाधनों में विकसित होते हैं, बल्कि जैव विविधता को भी मजबूत करते हैं। ये पक्षियों, मधुमक्खियों और अन्य जीवों के लिए प्राकृतिक आश्रय बनते हैं तथा पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि एक विकसित वृक्ष कई लोगों के लिए आवश्यक ऑक्सीजन उपलब्ध कराने में सक्षम होता है। इसलिए वृक्षारोपण केवल पर्यावरणीय गतिविधि नहीं, बल्कि जीवन के प्रति हमारी नैतिक जिम्मेदारी भी है। किसी भी शहर या देश की प्रगति केवल ऊंची इमारतों और चौड़ी सड़कों से नहीं, बल्कि उसकी हरियाली, स्वच्छ हवा और प्राकृतिक संतुलन से भी मापी जानी चाहिए।

इंदौर मॉडल : जनभागीदारी से हरियाली की मिसाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'एक पेड़ मां के नाम' अभियान को इंदौर ने जनआंदोलन का स्वरूप दिया है। 11 लाख से अधिक पौधे लगाकर शहर ने विश्व रिकॉर्ड स्थापित किया। नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय लगातार यह संदेश दे रहे हैं कि पर्यावरण संरक्षण की असली सफलता पौधे लगाने में नहीं, बल्कि उन्हें वृक्ष बनने तक सुरक्षित रखने में है। उनके नेतृत्व में अभियान जन-जागरूकता को नई दिशा दे रहे हैं। महापौर पुष्यमित्र भार्गव, प्रशासन, सामाजिक संगठनों और नागरिकों की सक्रिय सहभागिता ने यह सिद्ध किया है कि जब समाज और शासन साथ चलते हैं, तो पर्यावरण संरक्षण एक जनआंदोलन बन जाता है। स्वच्छता में देश का नेतृत्व करने वाला इंदौर अब हरियाली में भी नई पहचान बना रहा है।

आइए, हम सभी संकल्प लें कि केवल पौधे ही नहीं लगाएंगे, बल्कि उनकी देखभाल कर इंदौर को और अधिक हरा-भरा, स्वच्छ और आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर बनाएंगे। आज आवश्यकता इस बात की है कि पौधारोपण को उत्सव नहीं, संस्कार बनाया जाए। जन्मदिन, विवाह वर्षगांठ, धार्मिक आयोजन, सामाजिक कार्यक्रम या किसी प्रियजन की स्मृति हर अवसर को एक पौधे से जोड़ा जा सकता है।

मानसून प्रकृति का उपहार है। आइए, इस उपहार का स्वागत केवल बारिश देखकर नहीं, बल्कि धरती को हराभरा बनाने के संकल्प के साथ करें। आज लगाया गया एक पौधा आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी सबसे सुंदर और सबसे मूल्यवान 'हरियाली की विरासत' बन सकता है।

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