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20 साल पुराने दुष्कर्म मामले में बस क्लीनर की सजा बरकरार, लेकिन हाई कोर्ट ने किया ये बड़ा बदलाव

लंबी अवधि और परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने उसकी 7 साल की सजा को घटाकर जेल में बिताई गई अवधि तक सीमित कर दिया

By : Pramod Kumar , News11 Bharat
20 साल पुराने दुष्कर्म मामले में बस क्लीनर की सजा बरकरार, लेकिन हाई कोर्ट ने किया ये बड़ा बदलाव

न्यूज11  भारत

रांची/डेस्क: झारखंड हाईकोर्ट ने गढ़वा जिले में 20 साल पहले एक युवती के साथ हुए दुष्कर्म के मामले में अपना महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. न्यायाधीश प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने मामले के एकमात्र दोषी और बस क्लीनर सुरेश भुइयां की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है. हालांकि, मामले की लंबी अवधि और परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने उसकी 7 साल की सजा को घटाकर जेल में बिताई गई अवधि तक सीमित कर दिया है.

क्या था पूरा मामला?

घटना 20 अक्टूबर 2006 की है. पीड़िता वाराणसी से बस पकड़कर गुमला जाने के लिए निकली थी. सुबह लगभग 4:00 बजे जब बस गढ़वा के नगर उंटारी पहुंची, तो सभी यात्री उतर गए. इसी दौरान बस के क्लीनर सुरेश भुइयां ने पीड़िता को गुमला की दूसरी बस दिलाने का झांसा दिया और उसे बहला-फुसलाकर पास की एक पहाड़ी और बांध के पास ले गया. वहां उसने पीड़िता के साथ जबरन दुष्कर्म की वारदात को अंजाम दिया. पीड़िता के शोर मचाने पर जब ग्रामीण इकट्ठा हुए, तो आरोपी मौका पाकर फरार हो गया.

इसके बाद नगर उंटारी थाने में आईपीसी की धारा 376 के तहत मामला दर्ज किया गया था. गढ़वा की निचली अदालत ने 29-30 जुलाई 2009 को सुनवाई करते हुए आरोपी सुरेश को दोषी पाया और 7 साल सश्रम कारावास व 1000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई, जिसके खिलाफ दोषी ने हाईकोर्ट में अपील की थी.

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने दलील दी कि पीड़िता की मेडिकल रिपोर्ट में हालिया यौन उत्पीड़न की पुष्टि नहीं हुई थी और कई गवाह मुकर गए थे, इसलिए दोषी को संदेह का लाभ मिलना चाहिए.

हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि पीड़िता ने अदालत के सामने पूरी मजबूती और स्पष्टता से अपनी बात रखी. कानूनन पीड़िता का बयान ही आरोपी को सजा देने के लिए पर्याप्त है और उसमें किसी विरोधाभास की गुंजाइश नहीं दिखी.
बस के ड्राइवर ने कोर्ट में आरोपी की पहचान बस क्लीनर के रूप में की और घटना का समर्थन किया, जिससे आरोपी की पहचान को लेकर कोई संशय नहीं बचा.

सजा में बदलाव क्यों?

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यह घटना साल 2006 की है और तब से अब तक दो दशक (20 वर्ष) का समय बीत चुका है. इस दौरान पीड़िता और दोषी दोनों ही अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ चुके हैं और सेटल हो चुके हैं. दोषी का इसके अलावा कोई अन्य आपराधिक इतिहास भी सामने नहीं आया है. वह पहले ही मुकदमे के दौरान 2 साल 1 महीने और 6 दिन जेल में काट चुका है. इसलिए, न्याय के सिद्धांतों को देखते हुए उसकी 7 साल की सजा को घटाकर अब तक जेल में बिताई गई अवधि में बदल दिया जाता है.

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