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रांची/डेस्क: झारखंड हाईकोर्ट ने करीब 30 साल पुराने जातिसूचक गाली देने के मामले में एक हल्का कर्मचारी को बड़ी राहत दी है. कोर्ट ने निचली अदालत की ओर से सुनाई गई एक साल की सजा और 500 रुपये जुर्माने को रद्द कर दिया है. हाईकोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए कर्मचारी को आरोपों से बरी कर दिया.
जमीन की रसीद को लेकर शुरू हुआ था विवाद
यह मामला गुमला के रायडीह थाना क्षेत्र से जुड़ा है. वर्ष 1995 में जमीन की रसीद जारी करने को लेकर शिकायतकर्ता और तत्कालीन हल्का कर्मचारी के बीच विवाद हुआ था. शिकायतकर्ता का आरोप था कि जमीन की रसीद जारी करने के बदले उससे 1,000 रुपये की मांग की गई. शिकायतकर्ता ने इतनी रकम देने में असमर्थता जताई. इसके बाद रसीद जारी नहीं की गई.
इसके बाद 13 सितंबर 1995 को पंचायत भवन में रसीद जारी करने की मांग को लेकर विवाद हुआ. शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि इसी दौरान कर्मचारी ने उसके साथ गाली-गलौज की और जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया.
पुलिस जांच के बाद कर्मचारी के पक्ष में दी गई थी रिपोर्ट
शिकायत के बाद मामले की जांच की गई. जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने कर्मचारी के पक्ष में मामला खत्म करने की रिपोर्ट अदालत में दाखिल की थी.
हालांकि शिकायतकर्ता ने पुलिस की इस रिपोर्ट का विरोध किया. इसके बाद मामला आगे बढ़ा और अदालत में इसकी सुनवाई हुई. निचली अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कर्मचारी को दोषी माना. निचली अदालत ने जातिसूचक टिप्पणी करने के मामले में कर्मचारी को एक साल के सश्रम कारावास और 500 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी.
कर्मचारी ने दी निचली अदालत के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती
निचली अदालत के फैसले के खिलाफ कर्मचारी ने झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. हाईकोर्ट में उसकी ओर से दलील दी गई कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोप पर्याप्त साक्ष्यों से साबित नहीं होते हैं.
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने शिकायत, गवाहों के बयान और जमीन से जुड़े रिकॉर्ड समेत उपलब्ध सामग्री की जांच की.
जमीन की रसीद नहीं काटने के पीछे था दूसरा कारण
हाईकोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड पर गौर करते हुए पाया कि विवाद की शुरुआत जमीन की रसीद जारी नहीं किए जाने से हुई थी. संबंधित जमीन का बंदोबस्त शिकायतकर्ता के पक्ष में गलती से हुआ था. बाद में वरिष्ठ अधिकारी के आदेश के कारण उस जमीन की रसीद जारी नहीं की गई थी.
यानी रसीद जारी नहीं किए जाने के पीछे केवल कर्मचारी की व्यक्तिगत इच्छा या मनमानी का मामला नहीं था, बल्कि जमीन के रिकॉर्ड और वरिष्ठ अधिकारी के आदेश से जुड़ी स्थिति भी सामने आई थी.
जातिसूचक टिप्पणी के आरोप पर कोर्ट ने सबूतों को परखा
हाईकोर्ट ने इसके बाद उस आरोप की जांच की, जिसमें कर्मचारी पर जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया गया था.
अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयानों को देखते हुए पाया कि आरोप को साबित करने के लिए पर्याप्त और भरोसेमंद सामग्री मौजूद नहीं है. कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा.
हाईकोर्ट ने माना कि केवल आरोप लगाए जाने के आधार पर दोषसिद्धि बरकरार नहीं रखी जा सकती. आरोप को उपलब्ध साक्ष्यों से साबित करना जरूरी है.
निचली अदालत का फैसला रद्द
पूरे मामले पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने निचली अदालत की ओर से कर्मचारी को दोषी ठहराए जाने के फैसले को रद्द कर दिया. इसके साथ ही एक साल की सजा और 500 रुपये का जुर्माना भी खत्म कर दिया गया. हाईकोर्ट ने कर्मचारी को मामले में बरी कर दिया.
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